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देश में कोरोनावायरस नामक महामारी ने हाहाकार मचा दिया है जिसे रोकने के लिये सारे राज्य पूरी कोशिश कर रहे है। इसी कडी मे केद्रिय सरकार ने भी पूरे देश मे लॉकडाउन कर दिया है। इस महामारी के प्रभावो का सामना बिजली क्षेत्र भी कर रहा है। बंदी के दौर में पावर ग्रिड का लोड लगभग 30 प्रतिशत कम हो गया है। सभी राज्यो की बिजली मांग मे लगातार गिरावट आ रही है। इसी कारण से प्लांट भी कम लोड पर चल रहे है। इस महामारी से लडने और आपातकालीन व्यवस्थाऐ जैसे आस्पताल आदि  के लिये बिजली के महतव को दर्शाता है। इसलिये बिजली व्यवस्था मे जोखिम पैदा करना देश के लिये आत्मघाती साबित हो सकता था।

परन्तु, प्रधानमंत्री ने इसकी परवाह किये बिना इस लॉकडाउन में भी 5 आप्रैल को रात 9 बजें 9 मिनट के लिये बिजली बंद करने की जनता से अपील की। वर्तमान हालात को देखते हुये क्या इस तरह पावर ग्रीड के साथ खिलवाड देश के सामने क्या एक नई मुसीबत खडी कर सकता था। महामारी ने देश की अर्थव्यवस्था को पहले से ही ठप कर दिया है। और अगर बिजली उत्पादन नही होने या उत्पादन जानबूंज कर कम करने के आपने नुकसान भी है। सरकार द्धारा संचालित पावर सिस्टम ऑपरेशन कॉरपोरेशन का अनुमान था कि इस 9 मिनट की बिजली बंदी से लगभग 12,000 से 13,000 मेगावाट भार मे कमी आ सकती है। भारत में पर्याप्त पावर स्टोरेज के साधन उपलब्ध नही है जिससे उत्पादित बिजली को स्टोर करना मुश्किल है। जिस क्षण लोड कम होता है या बढ़ता है उसी क्षण किसी न किसी पॉवर प्लांट में उतना लोड कम किया जाता है या बढ़ाया जाता है। देश मे जो बिजली सप्लाई हो रही है उसका 70 प्रतिशत से ज्यादा थर्मल प्लांट से आता है। थर्मल प्लांट की लोड कम करने की क्षमता सीमित होती है। वो अगर अपनी क्षमता के 60 प्रतिशत से कम लोड पर चलाये जाएं तो उनके स्थायित्व पर संकट आ सकता है। यह बिंदु टेक्निकल मिनिमम कहलाता है। लॉक डाउन के चलते बड़ी संख्या में थर्मल प्लांट टेक्निकल मिनिमम या उसके आसपास ही चल रहे हैं।

कई राज्यो की सरकारो ने और वहा के बिजली विभागों ने सरकार को इस बिजली बंदी के क्षती के बारे मे अगाह किया था। महॉराष्ट्र के ऊर्जा मंत्री श्री नितिन राउत ने कहा कि वर्तमान में, राज्य में बिजली की मांग 23,000 मेगावाट से घटकर 13,000 मेगावाट हो गई है। बंदी के कारण, सभी उद्योग ठप है। 13,000 मेगावाट का लोड केवल आवश्यक सेवाओं और आवासीय पर ही है। अगर 9 मिनट के लिए एक साथ बिजली बंद की जाती तो बहु-राज्य ग्रिड का पतन हो सकता है और इसके परिणामस्वरूप पूरे देश में ब्लैकआउट हो सकता है।

इस आव्हान के तुरत बाद ही उत्तर प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कार्पोरेशन ने प्रधान मंत्री से अपील की थी कि बंदी के कारण प्रदेश में पहले से बिजली की मांग में कमी है। और अगर यह 9 मिनटी बिजली बंदी के आयेजन से प्रदेश के पावर ग्रीड में तेजी से 3000 मेगॉवाट की गिरावट आयेगी, इससे प्रदेश में ही नही पूरे देश के पावर ग्रीड में भी हाई वोल्टेज की समस्या आ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना था कि बिजली बंद का आव्हान अगर देश की 70 प्रतिशत जनता ने भी अमल कर दिया तो ग्रिड पर अचानक एक बड़ा जर्क आएगा। अनावश्यक तौर पर सारी आपातकालीन व्यवस्था ठप हो सकती थी।

हडबडाहट में पावरग्रिड कॉर्पोरेशन ने भी अपने क्षेत्रीय केंद्रों व स्टेशन के सभी प्रभारियों और क्षेत्रीय ट्रांसमिशन एसेट मैनेजमेंट सेंटर के कर्मचारियों को आवश्यक कर्मचारियों के साथ हाई अलर्ट पर रहने की सलाह दी है। नेशनल ट्रांसमिशन एसेट मैनेजमेंट सेंटर के साथ अत्यधिक सतर्कता बनाए रखने और तत्काल संपर्क करने की आवश्यकता पर जारे दिया। और इस बिजली बंदी से जितने भार की कमी होगी उसकी रिकवरी को हाइड्रो और गैस संसाधनों के माध्यम से नियंत्रित किया जायेगा। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के वरिष्ठ सदस्य व पूर्व इन्जिनीयर श्री के आशोक राव का कहना है कि बिजली बंदी की घोषणां के बाद बिजली विभागं के कर्मचारियों के पास बहुत ही कम समय था। प्रधानमंत्री की घोषणा और बिजली बंदी के आयोजन के बीच केवल 60 घण्टें फासला ही था। इस समय सीमा में ग्रीड को बचाने के लिए सीमा के भीतर वोल्टेज और लाइन लोड रखने के लिए, इंजीनियरों ने चुनिंदा ट्रांसमिशन लाइनों को बंद कर दिया। जिसका अर्थ है कि कुछ क्षेत्रों में घटना के पहले और दौरान बिजली नही थी।

ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे का कहना है कि 5 आप्रैल 2010 को रात 9 बजे से पहले राष्ट्रीय स्तर पर बिजली उत्पादन 1,17,000 मेगावाट था जो घटकर 86,000 मेगावाट पर आ गया, जबकि यूपी में यह 13,288 मेगावाट से घटकर 9,100 मेगावाट पर आ गया। इसका अर्थ है कि पावर सिस्टम ऑपरेशन कॉरपोरेशन के अनुमान से लगभग दोगुना 31,000 मेगावाट की राष्ट्रीय स्तर बिजली उत्पादन में कमी आई।

इस महामारी के दौर मे जब देश आर्थिक संकट से झूझ रहा है तब सरकार के द्धारा थाली ताली बजाने या बिजली बंद करना केडंल जलाना सरकार की गंभीरता पर सबाल खडे करता है। जनता व स्वास्थ्य कर्मचारी महामारी से बचनें के लिये बुनियादी सुविधाओं हेतु तरस रहे है और सरकार आपनी वाहवाही लुटने मे व्यस्त है। इस महामारी ने बिजली के महत्व की ओर इशारा तो किया है साथ ही बिजली के बुनियादी ढांचे की कमियो को भी उजागर किया है। बिजली उत्पादन और उसके वितरण के केद्रियकरण के नुकसान भी बताये है। इसलिये नीति निर्माताओं को बिजली के स्वच्छ संसाधनों और उसके अधिक से अधिक विकेद्रिकरण पर जोर देने की अवश्यकता पर विचार करे। ं

इस महामारी के दौर मे जनता को बिजली विभाग के कर्मचारियां का धन्यवाद करना चाहिये कि इतने कम समय मे एक आभूतपूर्व प्रयोग कर पावर ग्रीड को बैठने से बचाया। इस महामारी मे ना चाहकर भी बिजली विभाग के सभी कर्मचारियों इस आयोजन के कारण अचानक ड्यूटी पर तैनात होना पडा। नही तो पुरे देश को ना चाहकर भी इस बिजली बंदी का एक सप्ताह तक पालन करना पड सकता था। सरकार को माहामारी पर रोक लगाने के लिये कुछ ठोस कदम उठाने चाहिये ना कि बिजली बंदी या थाली ताली बजाओ कार्यक्रम से जनता को व्यस्त रखना।

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