Sharing is caring!

मध्यप्रदेश में बिजली के बढते वित्तीय घाटें जनता की जेब पर भारी पड रहे है। हाल ही मे म.प्र. पॉवर मैनेजमेन्ट कंपनी व अन्य कम्पनियों द्धारा टेरिफ बढाने हेतु एक याचिका आयोग के समक्ष दायर की गई। म.प्र.पॉवर मैनेजमेन्ट कंपनी व अन्य द्वारा कुल रू. 4098 करोड़ के घाटे की प्रतिपूर्ति के लिए भारी टेरिफ वृद्धि प्रस्तावित की है। उपरोक्त राशि में एक बड़ी राशि रू. 3919 करोड़ वित्त वर्ष 2013-14 में हुए घाटे को पूरा करने के लिए है, अर्थात् वर्तमान में प्रस्तावित बिजली दर में इजाफा कोयला, डीजल, कलपुर्जों, कर्मचारी व्यय इत्यादि में वृद्धि के कारण नहीं, बल्कि पिछली सरकार के चुनाव जीतने के लिये आपनाये गये हथकडों का परिणाम है। पिछली सरकार के ही वित्त वर्ष 2014-15 में हुए रू. 5156 करोड़ घाटे की सत्यापन याचिका आयोग में अभी भी लम्बित है। तथा वित्त वर्ष 2015-16 से वर्ष 2017-18 (तीन वर्ष) की सत्यापन याचिकायें अभी तक दायर ही नहीं की गई हैं। जिनका संभावित घाटा आने वाले वर्षों में जनता से टैरिफ के रूप मे वसूला जायेगा। म.प्र.विद्युत नियामक आयोग (खुदरा टेरिफ के निर्धारण हेतु शर्तें एवं नियम) अधिनियम’2015 के रेग्यूलेशन 8.3 के अनुसार उपरोक्त सभी याचिकायें अक्टूबर 2018 तक दायर हो जाना थी।

बिजली कम्पनियों द्वारा पिछली सरकार में वर्ष 2013-14 के आधार पर रू. 3919 करोड़ के घाटे को आयोग द्वारा स्वीकृत कर वर्ष 2019-20 का टेरिफ बढ़ाकर, उपभोक्ता पर थोपा जायेगा। मतलब वर्तमान सरकार अगले पांच वर्षों तक बीते 5 वर्षों के कार्यकाल/राजस्व घाटे की पूर्ति हेतु टेरिफ में वृद्धि करेगी। यह साफ जाहिर करता है कि राजनैतिक पार्टिया के चुनावी जुमलों का परिणाम आम जनता को ही भूगतना पडता है। जबकि टेरिफ अधिनियम’2015 के रेग्यूलेशन 8.3 में कहता है कि सत्यापन याचिकायें समय पर आयोग के समक्ष दायर न करने के फलस्वरूप पिछले घाटे को उपभोक्ताओं सें नही वसूला जा सकता।

म.प्र.पॉवर मैनेजमेन्ट कम्पनी की अनियमिताओ की सूची बहुत लम्बी है। कम्पनी टेरिफ याचिका में बिजली की उपलब्धता 90932 मिलियन यूनिट अनुमानित आंकलित की है। बिजली की आवश्यकता/माँग 69968 मिलियन यूनिट आंकलित की है, तथा इस प्रकार बिजली 20964 मिलियन यूनिट को सरप्लस दिखा कर, 8175 मिलियन यूनिट बिजली मंहगे बिजली सेन्टरों से कम बिजली उत्पादन का निर्देश देकर व शेष 13197 को मिलाकर अन्य राज्यों को सस्ते में रू. 3.26 की अनुमानित दर से बेचनका प्रस्ताव किया है, जिससे कि रू. 779 करोड़ के अतिरिक्त राजस्व प्राप्ति का अनुमान कर वार्षिक राजस्व आवश्यकता से कम किया गया है। लेकिन वास्तविकता मे बिजली वितरण हानि के अनुसार प्रदेश की बिजली आवश्यकता 80294 मिलियन यूनिट आंकलित की गई है। अर्थात वास्तविक रूप से 10326 मिलियन यूनिट बिजली की ज्यादा आवश्यकता है। जिसकी कीमत लगभग पाँच हजार करोड़ रूपये होती है। मूलरूप से म.प्र.पॉवर मैनेजमेन्ट कम्पनी आपनी उपलब्ध बिजली को अन्य राज्यो को सस्ते दरो पर बेच कर निजी कम्पनियां से अधिक दर पर खरीद रही है।

इसके अतिरिक्त म.प्र. पावर मैनेजमेन्ट कम्पनी देश के अन्य विद्युत गृहों से भी बिना बिजली खरीद अनुबंध के 40.73 मेगावाट जून 2018 में रू. 8.44 प्रति यूनिट की अधिकतम दर से खरीदा है। यह आश्चर्य का विषय है कि जब प्रदेश में सरप्लस विद्युत है, जिसके कारण प्रदेश के उपभोक्ताओं को लगभग रू. 3500 करोड़ प्रतिवर्ष का भुगतान बिना एक यूनिट बिजली खरीदे करना पड़ रहा है। वही म.प्र. पॉवर जनरेटिंग कम्पनी के सतपुड़ा ताप विद्युत गृह क्रमांक-2 (410 मेगावाट) को बन्द बता कर उपरोक्त बिना बिजली खरीद अनुबध के बिजली निजी कम्पनियो से खरीद रही है। वही अंतर्राजीय जल बिजलीघर रिहंद व माताटीला को बंद बताया गया है जबकि वास्तव में वित्त वर्ष 2017-18 व वित्त वर्ष 2018-19 में इन परियोजनाओ से क्रमशः 145 व 110 मिलियन यूनिट बिजली प्राप्त हुई है।

म.प्र.पावर मैनेजमेन्ट कम्पनी निजी विद्युत कम्पनी जैसे टोरेन्ट पावर अहमदाबाद बी.एल.ए. पावर, रिलायन्स पावर सासन लैंको अमरकण्टक विद्युत गृह से महेगे दरों पर बिजली खरीद रही है। जिसके चलते बिजली घाटे दिन व दिन बढ रहे है और उसका भार फिर जनता पर थोप दिया जाता है। जबकि वर्ष 2018-19 में निजी विद्युत कम्पनी बी.एल.ए. पॉवर व टोरेन्ट पॉवर से आयोग द्वारा कोई बिजली की उपलब्धता व कीमत स्वीकार नहीं करने के बावजूद बिजली खरीदी की गई है। बी.एल.ए. पॉवर के विरूद्ध दिये गये मामले का प्रकरण माननीय सर्वोच्च न्यायालय में लम्बित होने के बावजूद म.प्र. पावर मैनेजमेन्ट कम्पनी बी.एल.ए. पावर से बिजली खरीदने हेतु क्यों उत्सुक है।

केन्द्रीय विद्युत नियामक आयोग, म.प्र. विद्युत नियामक आयोग तथा अन्य संबंधित नियामक आयोग द्वारा प्रत्येक संबंधित बिजली घर हेतु वित्त वर्ष के आधार पर नियत प्रभार व ऊर्जा प्रभार निर्धारित किये जाते हैं, उपरोक्त वित्त वर्ष के आधार के अनुसार फिक्स चार्ज व ईंधन प्रभार की गणना न करना यह दर्शाता है कि म.प्र. पावर मैनेजमेन्ट कम्पनी जानबूझकर नियत प्रभार की सच्चाई को छुपा रही है। जिसके विशिष्ट उदाहरण छज्च्ब् की मोदा ताप विद्युत गृह है इस परियोजना के चरण-प्प् हेतु कुल बिजली आबंटन 226 मेगावाट, उपलब्धता 2056 मि.यू., नियत प्रभार रू. 68 करोड़ व बिजली दर रू. 2.84 प्रति यूनिट, बेकडाउन 809 मिलियन यूनिट अनुमानित है। जबकि केन्द्रीय विद्युत नियामक आयोग के टेरिफ आदेश अनुसार मध्यप्रदेश को आबंटित 226 मेगावाट से कुल मानक उपलब्धता 1580 मि.यूनिट व नियत प्रभार रू. 237 करोड़ होता है। म.प्र. पावर जेनरेटिंग कम्पनी के ताप/जल विद्युत गृहों हेतु कुल नियत प्रभार रू. 3947 करोड़ उल्लेखित है जबकि आयोग के टेरिफ आदेश अनुसार यह राशि लगभग रू. 6000 करोड़ होती है। अनुबंध के विपरीत बिजली खरीदी जाने से निजी विद्युत कम्पनी को पिछले 6 वर्षों में रू. 1000 करोड़ से ज्यादा का अनावश्यक भुगतान किया जा चुका है तथा प्रकरण उच्च न्यायालय तथा वर्तमान में लोकायुक्त भोपाल में विचाराधीन है। वैसे ही वित्त वर्ष 2017-18 में आयोग की मनाही के बावजूद, प्रकरण अपीलीय ट्रिब्यूनल से वापिस आयोग में सुनवाई होने के लिए वापसी के बावजदू बिना एक यूनिट बिजली खरीदे रू. 40 करोड़ का भुगतान मई’2018 में बी.एल.ए. पावर को कर दिया गया जो कि मैनेजमेन्ट कम्पनी के कुप्रबंधन का एक जीता जागता उदाहरण है। वर्तमान में भी आयोग की मनाही के बावजूद बिजली खरीदी की जा रही है। मध्यप्रदेश मे बिजली विभाग वित्तीय अनियमिताऐं को लगातार नजरअदांज कर रहा है जो ना केवल निजी कम्पनियो को फायदा पहुचा रहॉ बल्कि आनौपचारिक रूप से राजनैतिक पार्टिया भी इसका लाभ ले रही है।

विभिन्न निजी बिजली कम्पनियों से सम्पादित विद्युत क्रय अनुबन्ध में प्रावधान है कि म.प्र. पावर मैनेजमेन्ट कम्पनी द्वारा बिजली मांग न होने के कारण, शिड्यूल न की गई बिजली को निजी कम्पनी खुले बाजार में बेचने हेतु स्वतंत्र है तथा बेचने से निर्धारित ईंधन प्रभार के अलावा प्राप्त लाभ को सरकार और कम्पनी में बराबर-बराबर बांटा जायेगा। जैसे की जे.पी. बीना पावर से 1956 मिलियन यूनिट बिजली नहीं खरीदी जायेगी, जिसका कि पूर्ण नियत प्रभार का वहन म.प्र पावर मैनेजमेन्ट कम्पनी को करना पड़ेगा। किन्तु उपरोक्त बिजली को बाजार में बेचने से प्राप्त होने वाले लाभ को कैसे बाटा जावेगा क्या पद्धति होगी उसके पिनटान हेतु यह कही कोई जानकारी नही है। जबकि सभी निजी विद्युत कम्पनियाँ जिनकी बिजली शिड्यूल नहीं की जाती है के दौरान, वास्तविक समय के आधार पर उपरोक्त कम्पनियों द्वारा बाजार में बेची जा रही बिजली का प्रतिदिन 15 मिनिट के ब्लाक के आधार पर मात्रा, दर इत्यादि का पूर्ण विवरण आवश्यक रूप से बनाया जाना चाहिये। ताकि मासिक आधार पर नियत प्रभार से कम किया जा सके जो कि विद्युत कम्पनी व उपभोक्ता के हित में होगा।

निजी बिजली कम्पनियों को भुगतान किये जा रहे करोड़ों रूपये प्रतिमाह के बिजली बिलों के सत्यापन की कोई व्यवस्था/निगरानी नहीं है। निजी बिजली कम्पनियों द्वारा कोयले की कीमत/परिवहन लागत इत्यादि के कोई देयक न तो जमा किये जाते हैं, न ही म.प्र. पावर मैनेजमेन्ट कम्पनी द्वारा सत्यापन के लिए माँग किये जाते हैं। नियमों की अनदेखी कर करोड़ों के बिल तुरन्त पास कर दिये जाते हैं। यदि म.प्र .पावर जेनरेटिंग कम्पनी का ज्यादा दिन तक यही रूख रहा तो इसका भारी खाम्याजा सरकार और जनता दोनो को भरना पडेगा। बिजली क्षेत्र में सरकारी कम्पनियॉ को इस मोड पर लाकर खडा कर दिया है कि वे नियमों को ताक पर रख कर निजी कम्पनियो की पैरवी कर रही है। निजी कम्पनियॉ बिजली के नाम पर जनता की जेब काट करही है।

Help us in
* Demystifying finance to common people
* Making financial institutions transparent and accountable
* Spreading financial literacy programmes

Related Stories

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*