Sharing is caring!

अधोसंरचना, खासकर ऊर्जा के नाम पर हमारे देश में जो हो रहा है उसे सार्वजनिक सम्पत्ति की खुल्लम-खुल्ला लूट के अलावा क्या कहा जा सकता है? मध्यप्रदेश सरीखे राज्य में जहां खुद सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक जरूरत से दो-ढाई गुनी बिजली पैदा हो रही है, राज्य सरकार छह निजी कंपनियों से बिजली आपूर्ति के लिए 25-25 साल का अनुबंध कर रही है। यह अनुबंध इस शर्त के साथ किया जा रहा है कि राज्य में बिजली की मांग हो, न हो यानि बिजली खरीदी जाए या नहीं, कंपनियों को निर्बाध भुगतान किया जाता रहेगा। मांग नहीं होने के कारण बगैर बिजली खरीदे 2014, 2015 और 2016 में निजी कंपनियों को कुल 5513.03 करोड़ रूपयों का भुगतान किया गया है। जाहिर है, यह भुगतान आम जनता की जेबों से किया गया है। प्रस्तुत है, इस विषय की गहरी पड़ताल करता राजेश कुमार, गौरव द्विवेदी का यह आलेख।

Loader Loading...
EAD Logo Taking too long?

Reload Reload document
| Open Open in new tab

Download

Help us in
* Demystifying finance to common people
* Making financial institutions transparent and accountable
* Spreading financial literacy programmes

Related Stories

guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments