क्या ठेठ चुनावी गहमा-गहमी के दौरान कोई निजी कपनी अपनी बिजली की कीमतों में इजाफा कर सकती है? और ऐसा करते हुए उसे कोई देख, टोक तक नहीं पाता? गौर से देखें तो बिजली या इसी तरह के कोई और जिन्स का उत्पादन करने वाली निजी कंपनियों की यह ताकत बदल-बदलकर सत्ता संभालने वाली राजनीतिक पार्टियों ने ही बढ़ाई है। अब भस्मासुर बन चुकी ये कंपनियां राजनीतिक पार्टियों को ही ठेंगे पर मारते नहीं शर्मातीं। प्रस्तुत है, ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियों के कारनामों पर राजेश कुमार, का यह लेख।

एन लोकसभा चुनाव के बीचम-बीच ‘केन्द्रीय विद्युत विनियामक आयोग’ ने ‘अडानी मुद्रा पावर परियोजना’ की 2000 मेगावाट यूनिट का तय टैरिफ दो रुपए 80 पैसे प्रति यूनिट से बढ़ाकर तीन रुपए 10 पैसे करने का आदेश जारी कर दिया है। जाहिर है, इससे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और महाराष्ट्र की जनता पहले की तुलना में 30 पैसे अधिक की दर से बिजली खरीदेगी। आदेश बिजली क्षेत्र में निजी कंपनियों के नियमन जैसे बुनियादी सवालों पर मोदी सरकार का रूख भी उजागर करता है। यह आदेश ठीक लोकसभा चुनाव के दौरान आना अडानी जैसे कार्पोरेट घरानों के प्रति मोदी सरकार की निष्ठा दर्शाता है। यह प्रतिबद्धता केवल आम जनता की गाढ़ी कमाई पर अडानी जैसी निजी कंपनियों के अच्छे दिन लाने की बात करती दिखाई देती है। ‘केन्द्रीय विद्युत विनियामक आयोग’ का यह आदेश ना केवल अडानी ग्रुप की विद्युत परियोजनाओं के वित्तीय घाटों को चार राज्यों की जनता पर थोप रहा है, बल्कि यह भी इंगित करता है की भविष्य में वित्तीय संकट का सामना कर रही सभी विद्युत परियोजनाओं को संकट से उबारने में जनता की गाढ़ी कमाई ही बहाई जायेगी।

अडानी के एक और मामले पर नजर डाले तो ‘आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन’ का दावा है कि ‘अडानी पावर समूह, राजस्थान’ ने ‘अडानी कवई परियोजना’ हेतु बोली लगाने की प्रक्रिया के दौरान दो रेट दिये थे -एक, घरेलू कोयले के आधार पर और दूसरा आयातित कोयले के आधार पर। अडानी कम्पनी ने कहा था कि वह चाहे घरेलू कोयले का उपयोग करे या आयातित कोयले का, टैरिफ रेट घरेलू कोयले की दर के आधार पर ही लिया जायेगा। इन सभी शर्तो के साथ कम्पनी ने 2010 में बिजली खरीदी का अनुबंध किया था, लेकिन बिना किसी घरेलू कोयले की व्यवस्था के कम्पनी ने 2013 में, प्रांरभ से ही 660 मेगावाट की दो इकाइयों में आयातित कोयले का उपयोग करना चालू कर दिया। ‘कोल इंडिया लिमिटेड’ को सौ प्रतिशत कोयले की आपूर्ति करनी थी, लेकिन 2013 में कोयला वितरण नीति में परिर्वतन के कारण वह केवल 65 प्रतिशत कोयले की ही आपूर्ति कर पाई। नतीजे में पिछले पॉच सालों से कंपनी इंडोनेशिया से महंगे आयातित कोयले का उपयोग कर रही है। स्पष्ट है कि सरकार और ‘अडानी पावर कंपनी’ अपनी गलतियों के बदले जनता पर बढी हुई बिजली दरों को थोपना चाहती है।

पिछले कुछ समय में वित्तीय घाटे का सामना कर रहीं पावर कंपनियों को जनता के पैसों से बचाने, उबारने का चलन दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। जनता के अलावा इनकी बदहाली का बोझ जनता के ही धन से खडें किए गए सरकारी क्षेत्र के बैंकों, ‘भारतीय जीवन बीमा निगम,’ ‘पैंशन फंड’ और ‘म्यूचुअल फंड’ जैसे संस्थानों पर थोपा जा रहा है। भारत की लगभग 40 बिजली परियोजनाएँ अलग-अलग कारणों से वित्तीय संकट का सामना कर रही हैं। यह संकट सरकार की मिलीभगत, लापरवाही और बैकों की कर्ज देने की सुस्त प्रक्रिया के कारण खड़ा हुआ है। उक्त उदाहरण में ‘अडानी पावर कम्पनी’ पर सवाल उठाने की बजाय सरकार ने ‘केन्द्रीय विद्युत विनियामक आयोग’ के जरिए उसके घाटे की भरपाई करने की स्वीकृति दी है।

बिजली घोटालों की संख्या कम नहीं हो पा रही है और लगभग हर सुबह एक नया घोटाला सामने आ रहा है। फिर वह चाहे कृत्रिम टैरिफ का हो या कोयला खनन का, ‘विशेष आर्थिक जोन’ से जुड़ा हो या पावर परियोजनाओं हेतु मशीनरी के आयात और पावर क्षेत्र में बढ़ती गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (डूबत खातों, एनपीए या नान परफोर्मिंग असेट्स) का, इन सभी पर निजी कंपनियों की कार्यप्रणाली, जिम्मेदारियों और सरकारी नियमन के बगैर काबू पाना मुश्किल है। यह दर्शाता है कि बिजली क्षेत्र एक गहरे वित्तीय और सशक्त व जवाबदेह नियमन के आभाव के संकट से गुजर रहा है। भारत में सबसे बड़ा संकट अगर किसी क्षेत्र में है तो आज वह ऊर्जा क्षेत्र है।

हर दिन बैंकों की एनपीए, डूबत खाते की परिसंपत्तियाँ बढ़ती जा रही है। आज लगभग तीन लाख करोड़ रुपयों की एनपीए, गैर-निष्पादित परिसपत्तियाँ केवल बिजली उत्पादन क्षेत्र में हैं। यह भी जनता का ही पैसा है जो कभी बैंकां ने कर्ज के रूप में निजी कंपनियों को दिया था और जिसे आज वे वसूल नहीं कर पा रहे हैं। बैंक अपने इन घाटों की भरपाई जनता पर विभिन्न प्रकार के बैंक शुल्क लगाकर कर रहे हैं।

पिछले पाँच सालों में पावर कम्पनियों के एनपीए में लगातार वृद्धि ही हुई है। ‘इकोनोमिक एण्ड पॉलिटिकल वीकली’ के 14 मई 2016 के अंक में प्रकाशित लेख के अनुसार टैरिफ दरों में कृत्रिम रूप से वृद्धि का भी लगभग 50,000 करोड़ रुपयों का घोटाला है। यह घोटाला तीन तरीकों से किया गया-आयातित कोयले का लगभग 29,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का आयात बिल, लगभग 9,000 करोड़ रूपए मूल्य से अधिक का बिजली संयंत्र के उपकरणों की खरीदी का बिल और कम-से-कम 10,000 करोड़ रुपयों का कृत्रिम रूप से टैरिफ दरों में वृद्धि करने का लाभ इन बिजली कम्पनियों को मिला। इन सब पर ‘केन्द्रीय विद्युत विनियामक आयोग’ को जितनी मजबूती से संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी थी, वह नहीं की गई।

गौर-तलब है कि अडानी समूह की छः बिजली परियोजनाएँ कोयला और मशीनरी के आयात में मूल कीमत से अधिक के बिल पेश करने के आरोप में सुप्रीम कोर्ट में धोखाधडी के प्रकरण का सामना कर रही हैं। टाटा और एस्सार कंपनियां भी इसी तरह के प्रकरणों का सामना कर रही हैं और अडानी के मामले में आदेश की अपेक्षा कर रही हैं।

बिजली के नाम पर सरकार और कारर्पोरेट की बढ़ती सांठगाठ चारों ओर से जनता को लूट रही है। राज्य व केंद्र सरकार के माध्यम से निजी बिजली कम्पनियों ने नयी परियोजनाओं के नाम पर नदियों के किनारे हजारों एकड जमीन अर्जित कर रखी हैं। इन परियोजनाओं से विस्थापित हजारों परिवार आज भी अपने जीवनयापन के लिये मोहताज हैं। इन परियोजनाओं ने विकास के नाम पर विस्थापित कर ऊर्जा राजधानी सिगंरौली, कोरबा, तालचेर और धनबाद जैसे कई आदिवासी बहुल इलाकों को बर्बाद कर दिया है। आजादी मिलने के कुछ साल बाद, 1954 में रिहंद बांध के निर्माण के साथ सिगंरौली में शुरु हुए विस्थापन को लोग आज तक झेल रहे हैं।

‘केन्द्रीय विद्युत विनियामक आयोग’ ने अडानी पॉवर के नुकसान को बिजली की दरों में वृद्धि कर जनता से वसूलने की अनुमित देकर बिजली कम्पनियों को एक और ‘हथियार’ दे दिया है। यह ‘हथियार’ केवल एक या दो साल के लिये नहीं, बल्कि बिजली कंपनियों से होने वाले आम अनुबंधों की अवधि को देखते हुए 20-25 वर्षों के लिये दिखाई देते हैं। जाहिर है, किसी भी हालात में बिजली के इस खेल में फायदा या जीत केवल निजी कम्पनियों की ही होगी, नुकसान केवल और केवल आम जनता के हिस्से में ही आयेगा। ‘केन्द्रीय विद्युत विनियामक आयोग’ जैसी सशक्त संस्थाओं का निजी बिजली कम्पनियों के इतने बड़े घोटालों पर कोई संज्ञान ना लेना और उनके नुकसान की भरपाई बिजली दर नीति में बदलाव के द्वारा जनता के ऊपर थोपना बताता है कि जल्दी ही बिजली कंपनियां निजी हाथों में होंगी।

यह आलेख सुबह सवेरे समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ था।

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