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बजट 2020-21 अर्थव्यवस्था को ठीक करने का एक मौका चूक गया जो एक गहरी मंदी से गुजर रहा है और सभी आकडें अभूतपूर्व आर्थिक मंदी की ओर इशारा कर रहे है। इस मंद अर्थव्यवस्था में जब देश आर्थिक संकट से झुझ रहा है तब इस बजट से बहुत आपेक्षाऐं थी। कर और प्रोत्साहन बोनस के बावजूद धन सृष्टा ’या कॉर्पोरेट्स अर्थव्यवस्था सकंट से निकालने मे विफल रहे। यह उम्मीद की गई थी कि इस बार वित्त मंत्री लोगों की क्रय क्षमता बढ़ाने और सामाजिक क्षेत्रों पर अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी जो नौकरियों, स्वास्थ्य, आवास और शिक्षा बढ़ाने में मदद करेंगे। जबकि बजट भाषण से ऐसा करने का वादा किया। लेकिन वास्तव में आर्थिक विकास के लिए एक स्पष्ट रोड मैप दिेये बिना, यह सिर्फ एक आकांक्षा तक ही तक सीमित है,।

यह समय की जरूरत थी कि एक ठोस और दीर्घकालिक समाधान विकसित किया जाऐ जो अर्थव्यवस्था को संकट सें उबारने में मदद करें। सरकार लोगों के खर्च करने क्षमता को बढ़ाने हेतु कुछ उपाय करती, अनौपचारिक क्षेत्र जो भारत के 90 प्रतिशत कार्यबल का निर्माण करती है को प्रबल करती, सार्वजनिक क्षेत्र जो अर्थव्यवस्था में जिसका सबसे अधिक योगदान है और जो सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र हैै को मजबूत कर सकती थी। बैंकिंग क्षेत्र में चल रहे संकट को उबारने के बारे मे कुछ कहती  शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे प्रमुख क्षेत्रों के निजीकरण पर रोक लगाती, पिछले कई वर्षों से बढतां कृषि क्षेत्र मे संकट जिससे हजारों किसानों की आत्महत्या हो रही है, के बारे मे कुछ कहती।
स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली और अन्य क्षेत्रों में एक विफल पीपीपी मॉडल के माध्यम से निजीकरण को बजट मे को धक्का दिया, विश्व बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के एजेंडे को ही आगे बढ़ाया है। व्यापार में आसानी, बिजली क्षेत्र में सुधार, कर निर्धारण और सम्मानीय धन कुबेरो के नाम परं, कॉर्पोरेट सेक्टर को छूट की कई योजनाओ पेश की गई है जबकि वास्तविक धन सृजक-किसान और असंगठित क्षेत्र को आपने हाल पर ही छोड़ दिया है।
बजट अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के एजेंडे करों के अलावा व्यावहारिक रूप से सभी सार्वजनिक सेवा क्षेत्रों में पीपीपी मॉडल के प्रचार के संदर्भ में भी अधिक चर्चा करता है। पीपीपी मोड के माध्यम से 150 यात्री ट्रेनों के पुन विकास परियोजनाओं और संचालन से, शिक्षा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, कृषि, स्मार्ट शहरों और अस्पतालों में पीपीपी। भारत में सार्वजनिक निजी भागीदारी का यह मॉडल पूरी तरह से विफल रहा है।
यहां तक कि विश्व बैंक की वित्त पोषित पीपीपी मॉडल परियोजनाएं जल क्षेत्र और बिजली उत्पादन में ना केवल पूरी तरह विफल रही हैं बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र और उपभोक्ताओं को भारी नुकसान भरना पडा है।  पीपीपी मॉडल की विफलता का जीता जागता उदाहरणो मे से एक महत्वपूर्ण अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट्स रहे है।

सरकारी कंपनियों की बर्बादी
वित्त मंत्री ने सरकारी बैंकों को घाटे से उबरने के लिए बाजार से पैसा उठाने की बात कही और जरूरत पड़ने पर बैंकों को पैसा देने का वादा करके बैंकों को बजट से पैसा मिलने की उम्मीद्दों को नकार दिया।  एक और चैंकाने वाली घोषणा यह कि सरकार ने एलआईसी (LIC) को आईपीओ (Initial Public Offer) के माध्यम से शेयर बाजार में लिस्ट करके बाजार से पैसा उठाने का निर्णय लिया है। एलआईसी देश की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी है, जो तकरीबन 31 लाख करोड़ रुपये का लेनदेन संभालती है। एलआईसी ने पिछले साल सरकार के दबाव में आकर घाटे में चल रही आईडीबीआई (IDBI) बैंक में 13,000 करोड़ रुपये का निवेश करना पड़ा था। फिर एलआईसी और एसबीआई ने घफलों से ग्रस्त आइएल-एफएस (ILFS) को उबारा। और अंततः अब एलआईसी और आईडीबीआई बैंक के सरकारी हिस्से के शेयर बेचकर विनिवेश करके फंड जुटाने का निर्णय लिया है। वित्त मंत्री ने बैंकिंग क्षेत्र में किए गये सुधारवादी और संरचनात्मक परिवर्तनों का उल्लेख किया परंतु इन नीतियों का कुछ असर हुआ या नही, उसकी कोई चर्चा नहीं की। साथ ही साथ बैंकों की सबसे बड़ी समस्या माने जाने वाले एनपीए अर्थात गैर निष्पादित परिसंपत्तियों के आंकड़े, आइबीसी द्वारा की गयी वसूली और बट्टे खातों में डाले गये एनपीए पर भी मंत्री ने एक शब्द नहीं कहा।सभी बैंकिंग यूनियनों द्वारा बैंकों के विलय का बड़े पैमाने पर विरोध करने के बावजूद वित्त मंत्री इस एजेंडे को आगे बढ़ा रही हैं। अब यह स्पष्ट हो गया है कि जिन बैंकों का विलय किया गया था, उनमें मौद्रिक और मानव संसाधन, दोनों को गंभीर नुकसान हुआ है। एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइन्स के विलय के समय भी ऐसा ही हुआ था (जो अब आने वाले महीनों में बिक्री के लिए जा रहा है)।

भारतीय रिर्जब बैंक फंड
वित्त मंत्री निर्मला सितारमन ने आरबीआई से लिए गये अतिरिक्त धन के उपयोग की भी कोई जानकारी नहीं दी। यह लगातार तीसरा साल है कि सरकार ने आरबीआई के पास जो सरप्लस पैसा था उसको लिया है। सरकार ने वादे तो बहुत किये उसके बावजूद सरकार ने इस बात का कोई हिसाब नहीं दिया कि इस फंड को कैसे और कहां इस्तेमाल किया गया है।

डिपॉजिट बीमा कवरेज में बढ़ावा या एफएसडीआर बिल की ओर इशारा?
बैंक में जमा राशि के बीमा कवरेज को मौजूदा 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया गया है, हालांकि वैश्विक मानकों को ध्यान में रखते हुए इस बीमा को 15 लाख रुपये करने की मांग की जा रही थी। एफआरडीआई (FRDI) बिल (जिसे जनता के भारी विरोध की वजह से सरकार को वापस लेना पड़ा था) द्वारा फैलाये गये डर के बाद बैंकों में जमा बचत राशि की सुरक्षा, लोगों की एक प्रमुख मांग रही है। लोगों की जमा बचत राशि की सुरक्षा के नाम पर, वित्त मंत्री ने बीमा में मामूली वृद्धि की है, जो अपने आप में अपर्याप्त है और अपनी बचत को खोने वाले लोगों के मुद्दे को संबोधित भी नहीं करता है। बीमा कवरेज में यह वृद्धि एफएसडीआर बिल के आने की संभावना को मजबूत करती है, जिसकी वजह से लोगों की बचत एक बार फिर से खतरे में पड़ जाएंगी।

बिजली
बजट 2020-21 लोगो की उम्मीदो पर खरा नही उतर पाया। सरकार ने बिजली और अक्षय ऊर्जा क्षेत्र के लिए 22,000 करोड़ रुपये, पेरिस समझौते के सिद्धांतों की बाध्यता के साथ आपनी प्रतिबद्धताओं हेतु जलवायु परिवर्तन के मुद्दों को हल और आपने कार्बन पदचिह्न को कम करने के लिए 4400 करोड रूपये अलग से आवंटित किये। लेकिन पेरिस की सभी बाध्यताऐ केवल 1 रनवरी 2021 से ही लागू होगी यह कह कर जलवायु परिर्वतन के मुद्धो को खारिज कर दिया।
वित्त मंत्री ने कहा कि पुराने थर्मल पावर प्लांट जिनके उत्सर्जन का स्तर मापदडं से अधिक है उन्हें बंद किया जाना चाहिए और खाली की गई भूमि को वैकल्पिक उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाना चाहिए। लेकिन किन वैकल्पिक कार्यो उपयोग की जायेगी इसकी कोई स्पष्टता नही है। बिजली उत्पादन क्षेत्र में  तनावग्रस्त संपत्ति और गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के बढतें ढेर के बारे में कुछ कहा और ना ही एक शब्द निर्माणाधीन थर्मल पावर परियोजनाओं के बारे में कहा जो जल्द ही कार्यात्मक होने जा रहे हैं। सीईए के वर्तमान स्थिति से पता चलता है कि किसी भी थर्मल प्लांट ने दिसंबर 2015 के वायु प्रदूषण मानदंडों को पूरा नहीं किया है जिसकी समयसीमा दिसंबर 2019 थी। इससे संदेह पैदा होता है कि क्या वित्त मंत्री इस बारे में गंभीर है कि वह क्या कह रही है।
वित्त मंत्री ने अपने भाषण के दौरान 20 लाख किसानों के लिए सौर पंप स्थापित करने की योजना की घोषणा की, लेकिन उन्होंने किसी भी वित्तीय सहायता का उल्लेख नहीं किया जिसे किसानों को इन सौर पंपों को स्थापित करने की आवश्यकता होगी। इसके अलावा, बजट में बिजली क्रय को बढ़ावा दिया और  बंजर भूमि पर सौर ऊर्जा इकाइयों की स्थापना का उल्लेख किया है। किसानों को बंजर भूमि के भीतर उत्पादकता में सुधार लाने में मदद करने के बजाय, वित्त मंत्री सौर ऊर्जा संयंत्रों के लिए इन भूमि क्षेत्रों को बेचने का प्रस्ताव बना रही हैं। यह प्रस्ताब ना केवल पशुधन के लिए बल्कि इन भूमि के आसपास रहने वाले समुदायों के लिए भी खाद्य संकट पैदा करेगा। एक ओर रेलवे के स्वामित्व वाली भूमि में रेलवे पटरियों आजू बाजू बड़ी सौर क्षमता स्थापित करने के लिए बजट का प्रस्ताव है, लेकिन लोगों के लिए सुलभ, विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा के लिए न तो कोई संकेत है और न ही बजट आवंटन। यहा केवल एक सेक्टर से बदलकर दुसरे सेक्टर मे बड़े निगमों का एकाधिकार स्थापित किया जा रहा है जैसे थर्मल पावर प्लांट के स्थान पर अब अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में होने जा रहा है।
वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में वित्तीय संकट के गुजर रही राज्य बिजली वितरण कंपनियों के समाधान का प्रस्ताव रखा। इस संबंध में उठाए गए दो बड़े कदमों में पहला है कि अगले तीन साल में भारत भर में प्रीपेड स्मार्ट मीटरों के साथ पुराने मीटर को बदल दिया जाए और दूसरा कई बिजली आपूर्तिकर्ता फ्रेंचाइजी कंपनियों के साथ राज्य बिजली वितरण कंपनियों का निजीकरण किया जायेगा। उन्होंने कहा कि ये परिवर्तन ऊर्जा दक्षता और उपभोक्ता सेवाओं को फायदा पहुचायेगी और बिजली आपूर्तिकर्ताओं के बीच प्रतिस्पर्धा लाएंगे जिससे उपभेक्ता को लाभ होगा। जब अभी भी 24 करोड लोग अंधेरे में रहने के लिए मजबूर हैं, तब वित्त मंत्री प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगाने के लिए कह रहे हैं। स्मार्ट मीटर बिजली पहुंच की समानता को बर्बाद कर देगां क्योंकि उपभोक्ता आपूर्तिकर्ता की दया निर्भर हो जायेगे। जो अपनी मर्जी से बिजली दरों को तय करेगे और जो उस दर भर नही सकता उसको आयेग्य घोषित कर दिया जायेगा। इस प्रकार, प्रीपेड स्मार्ट मीटर व्यावहारिक रूप से बिजली सब्सिडी और सस्ती बिजली गरीब आबादी की पहुंच से दूर करेगा। और बिजली उपयोग का भारी बोझ गरीबों पर बढायेगा।
सभी के लिए 24×7 बिजली के लक्ष्य को साकार करने के लिए 2020-21 में नवीकरणीय ऊर्जा और बिजली क्षेत्र के लिए 22,000 करोड़ रुपये का अवटन का प्रस्ताव किया है। वित्त मंत्री का मानना है कि बिजली उत्पादन में कमी सभी के लिए बिजली प्रदान करने से रोक रही है, जबकि भारत बिजली क्षमता निमार्ण बिजली मांग से दोगुना है और भारत मे बिजली उत्पादन अधिक है। सभी को बिजली के वितरण को प्राथमिकता दिए बिना, केवल उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना वितरण में असमानता को बनाए रखेगा।
पावर सेक्टर की बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में एक बड़ी हिस्सेदारी है। इसे कम करने के तरीके को संबोधित किए बिना, नई और मौजूदा बिजली उत्पादन कंपनियों को नए कॉर्पोरेट कर में छुट केवल एनपीए को कम करने के बजाय बढायेगी।

इन्फ्रास्ट्रक्चर
राजमार्ग, जलमार्ग, तटीय और भूमि बंदरगाह सड़कों, आर्थिक गलियारों और स्मार्ट शहरों पर निरंतर जोर देना सरकार का पहले से ही एजेंडा रहा है जिसके परिणाम स्वरूप विस्थापन, घटती अजीविका, पर्यावरणीय नुकसान और जलवायु संकट में एक बड़ा योगदान रहा है।
बजट 2020-21 में विशेष रूप से इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर और अन्य अधिसूचित क्षेत्रों के लिए, विदेशी सरकारों के सॉवरिन वेल्थ फंड्स मे विदेशी निवेश के लिए 100 प्रतिशत कर रियायत की घोषणा की गई।  एनआईआईएफ, भारत का पहला सॉवरिन फंड् 2015 में शुरू हुआ, और इसने अब तक केवल विफल हवाई कंपनियों और मौजूदा हवाई अड्डे में हीं निवेश किया। प्राथमिक क्षेत्रों के इन्फ्रास्ट्रक्चर मेशायद ही कोई निवेश कर पाये।
दो इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनियों (इंडिया इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी लिमिटेड एवं राष्ट्रीय निवेश और इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड की एक सहायक कंपनी) को 22,000 करोड़ रुपये की इक्विटी सहायता प्रदान की जाएगी। यह उस 103 लाख करोड़ का हिस्सा होगा जो कि अगले पांच वर्षों तक इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए निहित की गई है तथा करदाताओं के पैसे का उपयोग उन परियोजनाओं में किया जाएगा जो लोगों और पर्यावरण के लिए हानिकारक होंगी।
उत्तर पूर्वी क्षेत्र के लिए एक विशिष्ट घोषणा की गई है साथ-साथ बहुपक्षीय और द्विपक्षीय वित्त पोषण एजेंसियों से सरलता से वित्तीय सहायता लेने का प्रावधान भी किया है। पहले से ही उत्तर पूर्वी क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाऐ एक आक्रामक तरीके से आ रही है, चाहे वो दक्षिण एशियाई राजमार्ग हो या जल विद्युत परियोजनाएं या ट्रांसमिशन परियोजनाएं हो। इस क्षेत्रों में एशियन डेवलपंमंट बैंकं जैसी संस्थाओं ने एक बड़े पैमाने पर निवेश किया है। जिसकी वजह से वहा का पर्यावरण पूर्ण रूप से नष्ट हो गया। इस क्षेत्र को संविधान द्वारा प्रदान किये गए आकांक्षा एवं संरक्षण का तथा वहा के भूमि कानूनों का भी सटीक उल्लंघन करता है। बहुपक्षीय और द्विपक्षीय वित्त पोषण एजेंसियों के लिए एक आसान रास्ते बनाना उन क्षेत्रों की स्थिति को और गंभीर बनायेगा।

कर निर्धारण
आज भारत के लगभग 1 प्रतिशत लोग देश की 42 प्रतिशत सम्पति के मालिक हैं। उन पर कर लगाने के बजाय सरकार उसके विपरीत कॉर्पोरेट करों और अन्य करों को कम करके और उनके व्यापार और धन निर्माण को आसान बना रही है। जिससे की राष्ट्रीय कोष में धन का नुकसान होगा, जिसका उपयोग स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण आदि में किया जा सकता था। करों में कमी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के करों के एजेंडे के अनुरूप है। सरकार ने पहले कॉरपोरेट टैक्स को 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया था और अब इसे घटाकर 22 प्रतिशत और विनिर्माण क्षेत्र की नई कंपनियों के लिए 15 प्रतिशत कर दिया है।
इसके साथ ही, सरकार ने ”इन्वेस्टमेंट  क्लीरेंस  सेल“ बनाने  की घोषणा की। इस सेल का काम निवेश की सलाह, जमीन और मंजूरीयाँ प्रदान करने के लिए निवेशको की सहायता करना होगा। यह सब कदम  ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग के तहत रैंकिंग में सुधार के एजेंडे को पूरा करता है जिससे की सिर्फ विदेशी निवेशों का फायदा है और साथ ही साथ देश की पर्यावरण और सामाजिक सुरक्षा को खतरे में डाला जा रहा है।ऑक्सफैम की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है, अगले 10 वर्षों के लिए सबसे धनी 1प्रतिशत पर कर निर्धारण में वृद्धि करने का मतलब होता की लाखों की संख्या में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुजुर्ग देखभाल अन्य क्षेत्रों में  नौकरियों या रोजगार पैदा करना।

बयानबाजी से नहीं ठीक होगी अर्थव्यवस्था
इस बजट में बैंकिंग अधिनियम को लेकर, सहकारी बैंकों, कम्पनी एक्ट में नागरिक अपराध को गैरआपराधिक और सेंट्रल बोर्ड ऑफ डाईरेक्ट टैक्सेशन में बदलाव शामिल हैं जिससे की नुकसान बचाया जा सके, लेकिन इन सभी बदलावों के बारे में कोई विस्तृत रूप से बताया नहीं गया है।
वित् मंत्री इन परिवर्तनों और संशोधनों को निर्दिष्ट करने में विफल रहीं। हमने पहले भी बजट में अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए ठोस उपायों का अभाव पाया है। कठोर, अधपके हुए और हानिकारक नीतिगत परिवर्तन जैसे कि डेमॉनेटिजेशन, कॉर्पोरेट्स के लिए कर में छुट, बैंकों का बिलय जैसे जरूरी बदलाव संसद में बिना किसी चर्चा के लोगों पर थोप दिये गए।
जब जीडीपी की वृद्धि दशकों में अपने सबसे कम स्तर पर है, तो कोई भी शांति से नहीं हो सकता है वित्त मंत्री ऐसा सख्ती और अर्थहीन तरीके से कहती हैं!

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