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फर्जी खबरों, ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव न्यूज, और 24/7 लाइव न्यूज अपडेट के दौर में, गहराई से, विश्लेषणात्मक और आलोचनात्मक लेखन के लिए जगह सिकुड़ गयी हैं। यह बात सभी विषयों के लिए सही है, लेकिन वित्त पर, जो हमारे जीवन के सभी क्षेत्रों को छूता है, तो और भी अधिक लागू होती है। युवा लेखकों पर केंद्रित स्मितू कोठारी फैलोशिप ऐसे लेखन के लिए थोड़ी जगह बनाने का प्रयास करती है।

यह फैलोशिप सभी युवा भारतीय लेखकों और शोधकर्ताओं के लिए है, जो किसी भी भारतीय भाषा में लिख रहे हैं एवं विकास वित्त में रुचि रखते हैं। यह फैलोशिप उन लोगों के लिए है जो वित्त की दुनिया को बाजार और बैंक के नज़रिए ऋण और विकास के चश्मे से परे देखते हैं। इस फैलोशिप के माध्यम से युवा-लेखकों को वित्तीय संस्थानों एवं तंत्रों की जवाबदेही को देखने में मदद मिलेगी, जो अपने द्वारा दिए गए ऋण के माध्यम से समुदायों, उनकी आजीविका, पर्यावरण को अपरिवर्तनीय नुकसान, जलवायु आपातकाल को बढ़ाते  हैं।

स्मितू कोठारी फैलोशिप को सेंटर फ़ॉर फ़ायनैन्शल अकाउंटबिलिटी, नई दिल्ली, ने  2018 में युवा लेखकों को विकास वित्त की दुनिया का गम्भीर अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से स्थापित किया था। फैलोशिप को स्मितू कोठारी की स्मृति में स्थापित किया गया है , जो की एक प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् और विद्वान-कार्यकर्ता थे और अनेकों पारिस्थितिक, सांस्कृतिक और मानव अधिकारों के संघर्षों में शामिल थे।

प्रथम स्मितु कोठारी फैलोशिप में छात्र, सामाजिक कार्य एवं पत्रकारिता से सम्बंध रखने वाले युवाओं ने अपनी रुचि दिखायी थी। पिछले वर्ष फैलोशिप के विषय: स्मार्ट शहरों और औद्योगिक गलियारों; जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय वित्त और भारत में इसके निवेश; सुंदरबन पर कोयला बिजली संयंत्रों का प्रभाव; ताप-विद्युत क्षेत्र में बढ़ते एनपीए को रोकने के लिए अपनाई गई रणनीतियों की प्रगति; और सौर ऊर्जा पार्क और स्थानीय आबादी पर उनके प्रभाव से संबंधित थे। प्रस्तावों के आधार पर, पांच उत्कृष्ट उम्मीदवारोंको फैलोशिप प्रदान की गई थी।

“स्मितु कोठारी फैलोशिप में चयन होना मेरे जैसे उभरते हुए शोधकर्ताओं — जो हमारे समय के उभरते हुए, कम शोध किए गए मगर चिंताजनक मुद्दों पर अधिक शोध करना चाहते थे — के लिए महत्वपूर्ण था। फेलोशिप की अवधि के दौरान, नए विचारों और आलोचनात्मक प्रतिक्रिया के साथ फेलोशिप टीम के समर्थन से मेरी समझ में गहराई आई है जो की मेरे काम में परिलक्षित होता है।”
अरविंद उन्नी, सार्वजनिक नीति और विकासात्मक कार्यकर्ता, फ़ेलो-2018

स्मितु कोठारी फैलोशिप केवल भारतीय नागरिकों को ही प्रदान की जाएगी। इस वर्ष क्षेत्रीय भाषाओं में काम करने वाले युवा लेखकों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

इस साल कुल आठ फैलोशिप प्रदान की जाएगी, जिसमें प्रत्येक फ़ेलो को 25,000 रुपये, जुलाई और सितंबर 2019 के बीच, तीन महीने के दौरान, नीचे उल्लिखित विषयों पर व्यापक शोध किए गए लेख लिखने के लिए दिया जाएगा। यह लेख सैधान्तिक या फिर किसी परियोजना विशेष पर भी हो सकते हैं:

  1. क्या आज की अक्षय ऊर्जा परियोजनाएं भारत के लिए एक स्थायी विकल्प हैं?
  2. गैर-बैंकिंग वित्तीय निगमों के सामने असन्न संकट।
  3. भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में उछाल: किस कीमत पर?
  4. समुदायों और पारिस्थितिकी तंत्र पर अंतर्देशीय जलमार्ग का प्रभाव।
  5. ईज ऑफ डूइंग बिजनस और पर्यावरण, भूमि और श्रम से सम्बंधित नीतियों में बदलाव
“स्मितु कोठारी फैलोशिप ने मुझे नाजुक पारिस्थितिकी प्रणालियों में पर्यावरण पर बड़ी बिजली परियोजनाओं के प्रभाव पर अपना काम शुरू करने में मदद किया।”
दिव्या राजगोपाल, वरिष्ठ सहायक संपादक, इकोनॉमिक टाइम्स, स्मितु कोठारी फ़ेलो-2018

आवेदन प्रक्रिया:

15 जुलाई, 2019 तक fellowship@cenfa.org में  निम्नलिखित दस्तावेजों और सामग्रियों के साथ अपना कवर पत्र, रेजयूम भेजें।

  • 500-800 शब्दों में विषय को चुनने के पीछे का तर्क, और आप प्रस्तावित अध्ययन को कैसे करना चाहते हैं।
  • आपके पहले के प्रकाशित काम।

आप एक से अधिक विषय पर प्रस्ताव भेज सकते हैं। गैर-मेट्रो शहरों से आवेदन करने वाली महिलाओं और उम्मीदवारों को आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

अपेक्षित प्रदेय:

  • फैलोशिप अवधि के पूरा होने के एक पखवाड़े के भीतर प्रस्तावित विषय पर न्यूनतम 1200 शब्दों का एक व्यापक विश्लेषणात्मक लेख।
  • सीएफए के समक्ष अपने निष्कर्षों को फैलोशिप के पूरा होने के बाद प्रस्तुति।

फ़ेलोज़ को अपने लेख प्रकाशित करवाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

“स्मितु कोठरी फ़ेलो के रूप में मुझे जलवायु परिवर्तन और वित्तीय अनियमितताओं के बारे में लिखने का मौका मिला। फेलोशिप के दौरान, मैंने देखा कि कैसे संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, यूएस ऐड और अन्य संगठनों द्वारा जारी जलवायु परिवर्तन या ग्रीन फ़ंड सीधे परियोजनाओं तक नहीं पहुंचते हैं। यह जमीनी स्तर पर क्रियान्वित की जा रही कुछ प्रमुख जलवायु परियोजनाओं को प्रभावित कर रहा है।”
कुशाग्र दीक्षित, वरिष्ठ संवाददाता, आईएएनए, स्मितु कोठारी फ़ेलो-2018

कॉपीराइट:

  • फ़ेलोज़ द्वारा किए गए काम का सारा अधिकार उनके ही रहेगा। हालांकि, सीएफए के पास उनके काम को अनुवाद और प्रकाशित करने का अधिकार सुरक्षित है।
  • फ़ेलोज़ को दिल्ली में एक अभिविन्यास कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जा सकता है।

हमारे बारे में:

सेंटर फ़ॉर फ़ायनैन्शल अकाउंटबिलिटी (सीएफए) राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की भूमिका, और विकास, मानवाधिकार, पर्यावरण के साथ अन्य कई क्षेत्रों पर उनके प्रभाव का समीक्षात्मक विश्लेषण एवं निरीक्षण करता है।

सीएफए नागरिक समाज समूहों, सामाजिक आंदोलनों और सामुदायिक समूहों के साथ भागीदारी करके यह सुनिस्चित करने का प्रयास करता है की वित्तीय संस्थान जनता के प्रति पारदर्शी एवं जवाबदेह रहें।

हम राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (बैंकिंग तथा ग़ैर-बैंकिंग दोनों), बहुपक्षिय एवं द्विपक्षीय संस्थानों, निर्यात साख एजेंसियों तथा नए बैंकों — एशियन  इन्फ़्रस्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) तथा न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) का समीक्षात्मक परीक्षण एवं निरीक्षण करते हैं।

हमारे कार्यों में अनुसंधान तथा कार्यक्रम डोनो शामिल हैं। हम सूचना संसाधन तथा नीति विश्लेषण दोनों का प्रकाशन करते हैं। हमारे जागरूकता कार्यक्रम जन जागरूकता में वृद्धि करके तथा वित्तीय जवाबदेही के मुद्दों पर जन-विमर्श को प्रोत्साहन देकर वित्त को सरल बनाने का प्रयास करते हैं।

सीएफए के प्रकाशन यहां देखें जा सकते हैं।

स्मितु कोठारी के बारे में:

स्मितु कोठारी एक प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् और विद्वान-कार्यकर्ता थे, जो पारिस्थितिक, सांस्कृतिक और मानव अधिकारों के मुद्दों में शामिल थे। अपने पूरे जीवन के दौरान, उन्होंने सामूहिक रूप से एक राष्ट्रीय और वैश्विक विकल्प बनाने की कोशिश की, जो सामाजिक रूप से न्यायसंगत और पारिस्थितिक रूप से समझदार हो।

भौतिकी, संचार और समाजशास्त्र में प्रशिक्षित, कोठारी ने अमेरिका में कॉर्नेल और प्रिंसटन विश्वविद्यालयों में पढ़ाया। वे द इकोलॉजिस्टएवं डेवलपमेंटके एक योगदान संपादक (कंट्रिब्युटिंग एडिटर) भी थे। एक लेखक और संपादक के रूप में, उन्होंने समकालीन आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की आलोचना की, एवं विकास परियोजनाओं के वित्तपोषण, विकास के कारण होने वाले विस्थापन और सामाजिक आंदोलनों के बारे में विस्तार से लिखा। उनके द्वारा संपादित कुछ पुस्तकें हैं: वायस ऑफ स्ट्रगल: सोशल मूवमेंट इन एशिया (2006); वॉयस ऑफ सैनिटी: इन सर्च ऑफ डेमोक्रेटिक स्पेस (2002); ए वाटरशेड इन ग्लोबल गवर्नेंस? एन इंडिपेंडेंट असेस्मेंट आफ द वर्ल्ड कमिशन आन डैम्ज़; द वैल्यू आफ नेचर: एकोलोजिकल पॉलिटिक्स इन इंडिया (2003); आउट आफ द नूक्लीअर शैडो  (जिया मियाँ के साथ, 2001); रीथिंकिंग ह्यूमन राइट्स: चैलेंजेज़ फॉर थ्योरी एंड एक्शन (1991); द नान-पार्टी पलिटिकल प्रॉसेस: अनसरटेन अल्टरनेटिव्ज़ (हर्ष सेठी के साथ, 1988)।

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