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एक जमाने में जो किसान बोनी, बखरनी और चैत जैसे कामों भर से खेती कर लिया करते थे, आज उन्हें पेचीदे कृषि कानूनों की भारी-भरकम किताबों का सहारा लेना पड़ रहा है। वजह है, खेती-किसानी में बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट कंपनियों का प्रवेश। मसलन, हाल में किसानों के बीज पर आलू-चिप्स बनाकर भारी मुनाफा कूटने वाली कंपनी ‘पेप्सिको’ की नजर लगी है। उसने अपने धंधे के लिए आलू के विशेष बीज को कानूनी रूप से अपने कब्जे में करवा लिया है। कैसे निपटेंगे, इस गोरखधंधे से किसान?

‘पेप्सिको इंडिया होल्डिंग्स’ और किसान अधिकार कार्यकर्ता कविता कुरुगंती के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद में सुप्रीमकोर्ट के हालिया फैसले ने भारत में किसानों के बीज के अधिकार और पौध की किस्मों पर कॉरपोरेट अधिकार के बीच जारी बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। यह मामला केवल ‘पेप्सिको’ और कुछ आलू किसानों के बीच कानूनी विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में भारत की कृषि व्यवस्था से जुड़ा एक बुनियादी सवाल है कि बीज पर अंतिम अधिकार किसका है? उस किसान का जिसने पीढ़ियों से बीज को बचाया, बोया और विकसित किया है या उस कंपनी का जिसने किसी विशेष पौध की किस्म का पंजीकरण कराया है?

सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन शामिल थे, ने ‘पेप्सिको’ की आलू की किस्म का पंजीकरण रद्द करने से इनकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ‘पेप्सिको’ द्वारा किसी किसान के खिलाफ कार्रवाई किए जाने पर संबंधित किसान ‘पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001’ के तहत अपने अधिकारों का दावा कर सकता है, बशर्ते किसान साबित कर सके कि वह उस प्रावधान के दायरे में आता है।

यहीं से कविता कुरुगंती की आपत्ति का महत्वपूर्ण बिंदु सामने आता है। उनका तर्क है कि कानून ने किसानों को अधिकार तो दिए हैं, लेकिन जब कोई कॉरपोरेट कंपनी किसानों पर मुकदमा करती है, तब किसानों को ही अदालत के सामने यह साबित करना होता है कि वे इन अधिकारों के पात्र हैं। यदि किसानों के खिलाफ मुकदमेबाजी का इस्तेमाल प्रतिस्पर्धियों को नियंत्रित करने या किसानों पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है, तो इसे केवल निजी कानूनी विवाद के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक जनहित के सवाल के रूप में देखा जाना चाहिए।
यह मामला ‘पेप्सिको’ द्वारा आलू की एक विशेष किस्म के पंजीकरण से जुड़ा है। इस किस्म का इस्तेमाल ‘लेज’ चिप्स के उत्पादन के लिए किया जाता है। ‘पेप्सिको’ ने इस किस्म का पंजीकरण 2016 में कराया था। इसके बाद वर्ष 2018 और 2019 में कंपनी ने गुजरात के कम-से-कम नौ किसानों के खिलाफ कथित बौद्धिक संपदा अधिकार के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए मुकदमे दायर किए थे और किसानों से भारी-भरकम क्षतिपूर्ति की मांग की थी।

व्यापक विरोध के बाद ‘पेप्सिको’ ने मई 2019 में ये मुकदमे वापस ले लिए, लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि यदि किसी किसान के खेत में संरक्षित किस्म पाई जाती है, तो उसके पारंपरिक खेती और बीज संबंधी अधिकारों की कानूनी स्थिति क्या होगी? कविता कुरुगंती ने इस पूरे प्रकरण को केवल किसानों के खिलाफ दायर मुकदमों के रूप में नहीं देखा। उन्होंने इसे किसानों के वैधानिक अधिकारों और कॉरपोरेट बौद्धिक संपदा अधिकारों के बीच टकराव के रूप में उठाया और ‘पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001’ के तहत ‘पेप्सिको’ के पंजीकरण को रद्द करने की मांग की।

दिसंबर 2021 में ‘पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण’ ने ‘पेप्सिको’ के पंजीकरण को रद्द कर दिया। इसके बाद मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा। एकल न्यायाधीश ने जुलाई 2023 में प्राधिकरण के निर्णय को कुछ आधारों पर बरकरार रखा, लेकिन जनवरी 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उस निर्णय को पलट दिया और ‘पेप्सिको’ का पंजीकरण बहाल हो गया। इसके बाद कविता कुरुगंती ने सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जिसके हालिया फैसले ने अब इस विवाद को एक नए कानूनी और सामाजिक संदर्भ में खड़ा कर दिया है।

‘पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001’ भारत के महत्वपूर्ण कृषि कानूनों में से एक है। इसका उद्देश्य नई किस्मों को कानूनी संरक्षण प्रदान करना, अनुसंधान एवं विकास में निवेश करने वाले प्रजनकों को प्रोत्साहित करना और उनके अधिकारों की रक्षा करना तथा किसानों के पारंपरिक बीज बचाने, उपयोग करने और खेती करने के अधिकारों को सुरक्षित रखना है। इस कानून के तहत संरक्षित किस्मों के उत्पादन, बिक्री, विपणन, वितरण, आयात और निर्यात पर (खासतौर पर कंपनियों को) विशेष अधिकार प्रदान किए जाते हैं। दूसरी ओर, इसी कानून में किसानों को अपनी उपज और बीज को सहेजने, उपयोग करने, बोने, दोबारा बोने, आदान-प्रदान करने, साझा करने या बेचने का कानूनी अधिकार है। इस कानून का संचालन ‘पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण’ द्वारा किया जाता है, जो ‘केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय’ के अधीन है।

सुप्रीमकोर्ट के ताजा फैसले से किसान संगठनों और बीज अधिकार आंदोलनों की लड़ाई समाप्त नहीं हुई है। अब संघर्ष का केंद्र किसान के व्यक्तिगत अधिकारों को जमीन पर लागू कराने और कानून की स्पष्ट व्याख्या कराने पर आ सकता है। किसान को यह समझना जरूरी है कि संरक्षित किस्म के संबंध में उसके पास कौन-कौन से अधिकार हैं और किन परिस्थितियों में ये अधिकार लागू होते हैं। कानून की जानकारी केवल वकीलों या विशेषज्ञों तक सीमित रहने से किसान अपने अधिकारों का प्रभावी इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। इसलिए किसान संगठनों को गांव स्तर तक बीज अधिकारों से संबंधित कानूनी जानकारी पहुंचाने की व्यवस्था करनी होगी।

भारत में बीजों पर नियंत्रण का सवाल आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण होने वाला है। कृषि में जैव-प्रौद्योगिकी, संकर बीज, नई पौध किस्मों और कॉरपोरेट निवेश का विस्तार हो रहा है। ऐसे में किसान समुदाय की पारंपरिक बीज प्रणालियां और स्थानीय जैव-विविधता भी दबाव में हैं। किसान के सामने चुनौती है कि उसके अधिकारों को केवल कानून की किताब में दर्ज प्रावधान न रहने दिया जाए, बल्कि खेत और गांव के स्तर पर उसका वास्तविक इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाए।

‘पेप्सिको’-किसान विवाद का अगला अध्याय शायद सुप्रीमकोर्ट में नहीं, बल्कि खेतों, किसान संगठनों, कानूनी सहायता समूहों और संसद के भीतर लिखा जाएगा। आने वाले समय में असली कसौटी यही होगी कि भारत का किसान अपने वैधानिक बीज अधिकारों का इस्तेमाल कितनी स्वतंत्रता से कर पाता है और राज्य इन अधिकारों की रक्षा के लिए कितनी प्रभावी व्यवस्था बनाता है। सुप्रीमकोर्ट का फैसला भले ही ‘पेप्सिको’ की पंजीकृत किस्म के संबंध में तत्काल विवाद को एक सीमा तक स्पष्ट करता हो, लेकिन किसान के बीज अधिकार और कॉरपोरेट बौद्धिक संपदा अधिकार के बीच व्यापक बहस अभी समाप्त नहीं हुई है।

असली सवाल यह है कि भारत की कृषि व्यवस्था में किसान की स्वतंत्रता और बीज पर उसका अधिकार कितना सुरक्षित रहेगा। यदि किसान का अधिकार सुरक्षित रहता है, तो यह केवल किसान की स्वतंत्रता की रक्षा नहीं होगी, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा, कृषि जैव-विविधता और आने वाली पीढ़ियों की कृषि स्वतंत्रता की भी रक्षा होगी। यही कारण है कि ‘पेप्सिको’ और कविता कुरुगंती का विवाद एक व्यक्तिगत या कॉरपोरेट विवाद से कहीं आगे भारत में बीज संप्रभुता और किसान अधिकारों की दिशा तय करने वाली बहस बन चुका है।

राज कुमार सिन्हा | बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

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