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पलायन वास्तव में घातक नहीं है, पर इसे घातक बना दिया गया है। आप कल्पना करके देखिए कि मानव सभ्यता में से पलायन को हटा दिया जाए, फिर इसके बाद की दुनिया के बारे में सोचिए। तब शायद आपको और बुद्धिजीवियों को पलायन का सकारात्मक पक्ष दिखे। नव-निर्माण, खोज, ज्ञान के विस्तार और समाज की बहुरूपता को समग्र रूप देने में पलायन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संसार का कोई भी भाग अपने-आपमें कभी संपूर्ण नहीं होता है। दुनिया भर की विविधता से ही, दुनिया समग्र होती है। पलायन की दूसरी परिभाषा यह भी है कि जब लोगों के स्थानीय संसाधन सीमित हो जाते हैं, तब वे दूसरे इलाकों की तरफ सफर शुरु करते हैं और देश के किसी दूसरे हिस्से में जाकर अपने कौशल का उपयोग करके न केवल अपने लिए जीविका का अर्जन करते हैं, बल्कि उस नए इलाके को एक नयापन भी देते हैं। यह अलग बात है कि कुछ लोग राजनीति चमकाने के लिए ऐसा महौल बना देते हैं कि वे(पलायनकर्ता) उस क्षेत्र के लोगों या श्रमिकों के प्रतिस्पर्धी हैं, कदापि यह सच नहीं है।

पर बीते कुछ दशकों से बुन्देलखण्ड में पलायन एक समस्या के रूप में उभरा है। अब आलम यह हो गया है कि बुन्देलखण्ड के लगभग हर मौसम में छोटे-बड़े(गांव-कस्वा-शहर) बस स्टेशन या रेल्वे स्टेशन(झांसी वाली लाइन को छोड़ दें, तो पाएंगे कि रेल्वे या तो है नहीं, और यदि है भी, तो वह दिखावे के लिए है) पर पाँच से लेकर पचास लोगों तक के जत्थे बोरी में समान बंधे हुए, बिस्तर का बंडल लिए हुए, महिलाएं बच्चों को गोदी में लिए हुए यात्रा के साधन का इंतजार करते हुए नजर आ जायेंगे। इनकी उम्र, जाति, धर्म और गांव में अंतर हो सकता है लेकिन सभी एक ही बीमारी के मरीज हैं। इनकी बीमारी का नाम ‘बदहाली में पलायन’ है। यह अपनी इच्छा से नहीं बल्कि गांव में जीविका और रोटी के साधन खत्म हो जाने के कारण पलायन कर रहे हैं। यह लोग दिहाड़ी मजदूरी के लिए पलायन करते हैं। यदि दो-चार लोगों को अनायास कहीं फैक्ट्री में काम मिल भी गया, तो वह दिहाड़ी मजदूरी के जैसा काम ही मिलता है।

बुन्देलखण्ड में पलायन का हाल यह हो गया है कि कोरोना संकट के दौरान हुए लॉकडाउन में दो वीडियो तेजी से वायरल हुए थे। इनमें से एक था छतरपुर जिले के बड़ा मलहरा तहसील के निवासी का, जिसमें लगभग 35 साल का आदमी अपने परिवार के सदस्यों के साथ साइकिल पर समान लादकर नंगे पाँव पैदल अपने घर को लौट रहा था, उसके साथ छोटे-छोटे बच्चे भी थे। जब बी.बी.सी. के रिर्पोटर ने उससे बात की, तो रोते हुए उसने पुलिस और शासन की बरबरता के बारे में बताया। कड़ी धूप और उन परिस्थितियों को देखकर रिर्पोटर भी भावुक हो गया। और उसने अपने जूते उतारकर उस आदमी को दे दिए। जिसने भी यह दृष्य देखा, आंखों में आंसुओं को नहीं रोक पाया। दूसरा वीडियो कांग्रेस पार्टी के पूर्वाध्यक्ष राहुल गांधी का था, जिसमें वह लॉकडाउन के कारण पैदल जा रहे मजदूरों के समूह से सड़क के किनारे बात कर रहे थे। वह मजदूर झांसी-ललितपुर जिले के निवासी थे। यह वही वीडियो था जिस पर वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि(कथन का तर्जनुमा) राहुल गांधी ने मजदूरों का समय खराब किया। यदि वह मजदूरों की मदद ही करना चाहते थे, तो उनका सामान उठाकर उनके साथ चल देते। शायद वित्तमंत्री जी को पता नहीं होगा कि राहुल गांधी ने उनके लिए दो कारों की व्यवस्था की थी, और गांव तक भेजा था। इसके बाद की सच्चाई यह है कि इन दोनों वीडियों में देखे गये परिवारों ने पुनः पलायन किया(दोनों परिवारों के पलायन के संबंध में लेखक को यह जानकारी, उसके विश्वसनीय साथियों से प्राप्त हुई है। पर लेखक इसकी पूर्णतः पुष्टि नहीं करता है)।

कोरोना महामारी के कारण बुन्देलखण्ड के पलायन की स्थिति को जानने के लिए लेखक ने बुन्देलखण्ड के छतरपुर जिले की तहसील बिजावर की 60 पंचायतों पर सर्वे किया। जिससे कई रोचक तथ्य निकलकर आये। कोरोना महामारी के दौरान बिजावर जनपद की 60 पंचायतों से पलायन करने वालो में से 12488 लोग वापस अपने घर आये। यह आंकड़ा और अधिक हो सकता था, पर सरकार ने यातायात पूरी तरह से बंद ही कर दिया था। कुछ लोग इसलिए भी नहीं लौट पाये क्योंकि ठेकेदार ने पैसे नहीं दिए, और वह स्वयं पैसे की व्यवस्था कर नहीं पाये। लॉकडाउन मे वापस आये लोगों से बात करने पर पता चला कि ज्यादातर लोगों को मजदूरी का पैसा ठेकेदार या कंपनी ने दिया ही नहीं है। वह कैसे भी पैसों की व्यवस्था करके अपने घर लौटे हैं। कोई निश्चित संख्यात्मक आंकड़ा नहीं है, ऐसे लोगों का। पर लेखक की जितने भी वापस गांव आये लोगों से मुलाकात हुई, उनमें से किसी को भी पूरे पैसे नहीं मिले थे। इनमें वो लोग ज्यादा हैं, जिन्हें बिलकुल पैसे नहीं मिले। इस मुद्दे पर लेखक ने कम-से-कम डेढ़ सौ से अधिक पलायनकर्ताओं से बात की। ऐसे लोग किसी एक गांव या जाति के नहीं थे। कुछ पलायनकर्ताओं का यह भी कहना था कि लॉकडाउन के शुरुआत में यातायात के कुछ साधन नहीं थे, और ठेकेदार बार-बार धमका रहे थे कि यदि अभी घर लौटे तो आपको पैसा नहीं मिलेगा। कई महिनों तक ठेकेदारों ने हिसाब नहीं किया क्योंकि उन्हें डर था कि कही मजदूर घर न लौट जाएं। महानगरों से बुन्देलखण्ड के किसी भी हिस्से में वापस आये पलायनकर्ताओं की कमोवेश यही स्थिति है।

कोरोना महामारी से वापस आये 12488 पलायनकर्ताओं में से मात्र अभी 232 लोग ही गांव में बचे हैं। बाकि सभी फिर से पलायन कर गये हैं। 12256 के दौबारा पलायन करने के पीछे वही सब कारण हैं। जिनके कारण बुन्देलखण्ड में पलायन शुरु हुआ था। बिजावर जनपद की सबसे बड़ी पंचायत अनगौर है। वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर अनगौर की जनसंख्या 6669 है। वहां के शासकीय स्कूल के शिक्षक ने बताया की इस पंचायत से लगभग 45 प्रतिशत से अधिक पलायन होता है। पर लॉकडाउन में मात्र-439 लोग ही वापस आये। जैसे ही लॉकडाउन हटा और कुछ महिने बाद 432 लोग पुनः पलायन कर गये। लॉकडाउन में वापस आए लोगों में केवल सात लोग ही रह गए हैं। ग्राम पंचायत अमरोनियां की आबादी 2011 की जनगणना अनुसार 2009 है। लॉकडाउन में 291 पलायनकर्ता वापस आये। इसमें से मात्र दस रह गए हैं। बाकी सब दौबारा पलायन कर गए हैं। लॉकडाउन के दौरान वापस आए पलायनकर्ताओं में सबसे अधिक अमरोनियां और नैगांव में दस-दस लोग रुके हैं। अन्य सभी पंचायतों का आंकड़ा इससे कम ही है। ग्राम पंचायत बांकीगिरौली और कसार में जितने पलायनकर्ता लॉकडाउन के दौरान आये थे। पूरे-के-पूरे पुनः लौट गए और नए लोगों ने जो पलायन किया है, वह अलग है। जबकि बिजावर जनपद में कोरोना के कुछ ही मामले देखे गए हैं, यहां कोरोना का संक्रमण बहुत कम हुआ है। छतरपुर जिले में 25 मार्च तक कोरोना संक्रमण से 32 लोगों की मृत्यु हुई है, जबकि 2039 लोग संक्रमण के बाद डिस्चार्ज हुए एवं जिले में कुल पोजिटिव लोगों की संख्या 2095 है।

बुन्देलखण्ड की स्थिति दिन-प्रतिदिन अनियंत्रित पलायन के कारण खराब ही होती जा रही है। सरकारों के पास अच्छा मौका था कि बुन्देलखण्डियों को विश्वास में लेकर एक नई शुरुआत करते, तो कोरोना के बाद का बुन्देखण्ड, नया बुन्देलखण्ड होता।

Picture courtesy: Wikimedia Commons

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