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कैंब्रिज के अर्थशास्त्री, हा-जून चांग का मानना है कि ‘अर्थशास्त्र का 95 प्रतिशत सिर्फ सामान्य समझ है, जिसे गणित और भारी-भरकम शब्दावली का प्रयोग करके मुश्किल बनाया जाता है।’ इससे हम समझ सकते हैं कि लोग वित्त से जुड़े मामलों से दूर क्यों रहते हैं। सरकारें नयी परियोजनाओं, योजनाओं और कार्यक्रमों की घोषणा करती हैं जिन पर भारी मात्रा में जनता के पैसे ख़र्च होते हैं। इन सभी को ‘विकास’ तथा नागरिकों के जीवन में सुधार लाने के नाम पर औचित्यपूर्ण ठहराया जाता है। शायद ही कभी इन परियोजनाओं के वित्तपोषण के स्रोत, इनकी वित्तीय व्यवहार्यता या राजकोष पर इससे पड़ने वाले वित्तीय भार पर कोई सवाल उठाया जाता है। यह काम बस ‘विशेषज्ञों’ पर छोड़ दिया जाता है। कुछेक मामलों में ऐसे कुछ सवाल खड़े भी किए गए तो उन्हें सार्वजनिक भलाई और प्रगति के नाम पर चुप करा दिया गया।

दिल्ली मेट्रो भी एक ऐसा ही उदाहरण है जहाँ इसकी आलोचना से संबंधित सवालों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई तथा मेट्रो की चमक-धमक और ‘सुविधा’ के कारण बहुत आसानी से ऐसा प्रतीत कराया गया कि सब ठीक-ठाक है।

दिल्ली मेट्रो के प्रभाव, शहर में सड़कों पर भीड़-भाड़ कम करने में इसकी सफलता, इसका खर्च उठाने की हमारी क्षमता, वित्तीय व्यवहार्यता तथा यातायात एवं परिवहन के अन्य साधनों से इसकी तुलना करने के लिए एक समीक्षात्मक अध्ययन किए बगैर इसे अन्य शहरों में बढ़ावा दिया जा रहा है और ‘दुहराया’ जा रहा है।

किसी भी परियोजना की कुल लागत सिर्फ ‘वित्त’ तक ही सीमित नहीं होती। ऐसी कई अन्य लागतें होती हैं जिन्हें पैसे से जोड़कर नहीं देखा जा सकता, जैसे सामाजिक तथा पर्यावरणीय लागत। इस बात को मानते हुए, इस अध्ययन में केवल दिल्ली मेट्रो की वित्तीय लागत तथा व्यवहार्यता पर ही ध्यान दिया जा रहा है।

हम उम्मीद करते हैं कि यह अध्ययन आम लोगों को दिल्ली मेट्रो के वित्तीय पक्षों को समझने में मदद करेगा तथा अन्य शहरों में ‘मेट्रो’ की ‘लागत’ पर एक चर्चा शुरू करने में योगदान देगा, इससे पहले कि उन्हें शहर के नागरिकों पर थोप दिया जाए। इसके अतिरिक्त, हम यह भी आशा करते हैं कि इसके जरिए ‘किसका पैसा’ और उसे ‘किस तरह खर्च किया जा रहा है’ जैसे बुनियादी सवालों को उठाने में भी मदद मिलेगी।

 

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