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मध्यप्रदेश राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) की कार्यशैली को लेकर विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है।मई 2025 में, सिया ने एक दिन में ही 450 परियोजनाओं को मंजूरी देकर स्वीकृत कर दिया गया था। जबकि आवश्यकता अनुसार साझी बैठक बुलाना अनिवार्य था। इस प्रक्रिया में बैठक आयोजित नहीं की गई, फाइलें जानबूझकर लंबित रखी गईं, और समय सीमा समाप्त होने पर स्वीकृति अपने आप मान ली गई,जो नियमों का उल्लंघन है।इसमें 200 से अधिक परियोजनाएं खनन विभाग से संबंधित थीं, जिसमें भ्रष्टाचार की गंभीर आशंका है। पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2006 के अनुसार, पर्यावरणीय मंजूरी के लिए संबंधित प्राधिकरण की सामूहिक बैठक आवश्यक है। यह नियम पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। तकनीकी मूल्यांकन, जन-सुनवाई जैसी प्रक्रियाओं की अनदेखी हुई। कई मामलों में खनिज की मात्रा या नाम तक बदल दिए गए ताकि गैरकानूनी कृत्यों को कानूनी रूप दिया जा सके।आरोप है कि इस पूरा मामला खनन माफिया और दलालों को फायदा पहुंचाना था।
 
अधिकारियों ने अनुमति प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर सिया की स्वायत्तता कमजोर करने का प्रयास किया गया है।अन्य परियोजनाओं की मंजूरी पर भी विवाद उठी—जब सहमति से ये मंजूरियां दी गईं, तब सदस्य सचिव ने असहमति जताई और प्रक्रिया को अवैध करार दिया। 28 मार्च से 21 अप्रैल 2025 तक सिया में कोई बैठक नहीं हुई, सैकड़ों फाइलें लंबित रहीं। अप्रैल–मई 2025 में केवल तीन बैठकें हुई—लेकिन इनमें भी अधिकांश स्वीकृतियां सदस्य सचिव ने अकेले दी।
 
सिया के चेयरमैन शिवनारायण सिंह चौहान ने इन फर्जी मंजूरियों को उजागर किया, कई बार बैठक बुलाने का अनुरोध किया, लेकिन जवाब नहीं मिला। उन्होंने मुख्यमंत्री और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को पत्र भेजकर इस प्रक्रिया को गैरकानूनी बताया। साथ ही एफआईआर दर्ज करने की मांग की। चेयरमैन एसएनएस चौहान ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाया है कि मूल्यांकन प्रक्रिया को दर किनार कर 237 परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृतियां दें दी गई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि सिया की सदस्य सचिव उमा महेश्वर और पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी ने मिलकर प्राधिकरण की बैठकों में देरी की, ताकि खनन माफियाओं को फायदा पहुंचाया जा सके। आरोप है कि इसके लिए सिया की अनिवार्य मूल्यांकन प्रक्रिया को भी दरकिनार कर कई प्रोजेक्ट्स को बिना अधिकार स्वीकृति दे दी। 24 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव–प्रधान सचिव को नोटिस जारी किया। यह नोटिस 237 अवैध पर्यावरणीय मंजूरियों को लेकर जारी किया गया था, जहां सदस्य सचिव द्वारा सिया को बायपास कर स्वीकृतियां दी गई थी। कोर्ट ने पूछा कि ये मंजूरियां बिना सिया की बैठक के कैसे दी गईं, और उनसे दो सप्ताह में जवाब मांगा गया।इस मामले पर विगत सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बहुत गंभीर माना और केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।इस मामले में कोर्ट ने टिप्पणी किया है कि आईएएस अधिकारी पर्यावरण स्वीकृति जारी करेंगे, तो फिर राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण की स्वतंत्र संस्था होने का क्या मतलब रह जाएगा?
 

राज्य पर्यावरण प्रभाव प्राधिकरण के गठन की पृष्ठभूमि

मध्य प्रदेश राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण को भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के नियम 5 के उप-नियम (3) के तहत पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2006 के अन्तर्गत अधिसूचित किया है, जिसमें नई परियोजनाओं या गतिविधियों पर कुछ प्रतिबंध और निषेध लगाए गए हैं, मौजूदा परियोजनाओं और गतिविधियों के विस्तार या आधुनिकीकरण पर उनके संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार करना है। अधिसूचना के तहत, कुछ नई परियोजनाओं, मौजूदा परियोजनाओं के विस्तार या आधुनिकीकरण के लिए, उनके पर्यावरणीय प्रभाव की क्षमता के आधार पर, पूर्व पर्यावरणीय मंज़ूरी प्राप्त करना अनिवार्य है। अधिसूचना की अनुसूची में श्रेणी ‘क’ के अंतर्गत आने वाली परियोजनाओं के लिए, भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से पर्यावरणीय मंज़ूरी आवश्यक है।जबकि श्रेणी ‘ख’ के अंतर्गत आने वाले मामलों के लिए, गतिविधियों की सीमा के आधार पर, राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (एसईआईएए) से मंज़ूरी आवश्यक है। अधिसूचना में प्रदूषण कम करने और पर्यावरण संरक्षण हेतु पर्यावरणीय मंज़ूरी प्रदान करने एक राज्य विशेषज्ञ मूल्यांकन प्राधिकरण ( सिया) के गठन का प्रावधान है। सिया की सहायता के लिए, एक राज्य विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (एसईएसी) का गठन किया गया है। विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति परियोजनाओं की जांच करेगी और पर्यावरणीय मंजूरी प्रदान करने पर निर्णय लेने हेतु अपनी सिफ़ारिशें सिया को भेजेगी। पर्यावरण आंकलन अधिसूचना को पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 के अन्तर्गत सबसे पहले 1994 में जारी किया गया था।इसके पहले यह कार्य महज प्रशासनिक जरूरत होता था। लेकिन 27 जनवरी 1994 में पर्यावरण प्रभाव नोटीफिकेशन के जरिये एक विस्तृत प्रकिया शुरू किया गया।इस नोटीफिकेशन के अन्तर्गत 32 औधोगिक एवं विकासात्मक परियोजनाओं को शुरू करने के लिए केन्द्र सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया गया।जिसमें बङे बांध, माइंस, एयरपोर्ट, हाइवे,समुद्र तट पर तेल एवं गैस उत्पादन, पेट्रोलियम रिफाइनरी, कीटनाशक उधोग, रसायनिक खाद, धातु उधोग, थर्मल पावर प्लांट, परमाणु उर्जा परियोजना आदि शामिल है।परियोजनाओं को एक विस्तृत प्रकिया से गुजरना आवश्यक बनाया गया।जिसके तहत पर्यावरण प्रभाव निर्धारण रिपोर्ट (ई.आई.ए) तैयार कर सार्वजनिक करना एवं जन सुनवाई महत्वपूर्ण माना गया।ई.आई.ए रिपोर्ट अंग्रेजी तथा प्रादेशिक और स्थानिय भाषा में जिला मजिस्ट्रेट, पंचायत व जिला परिषद, जिला उधोग कार्यालय और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के संबंधित क्षेत्रीय कार्यालय में उपलब्धता सुनिश्चित करना अनिवार्य किया गया।इसका मुख्य उद्देश्य था कि सभी विकास परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का केवल सही- सही आंकलन ही न हो बल्कि इस आंकलन प्रकिया में प्रभावित समुदायों का मत भी लिया जाए और उसी के आधार पर परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी देना या नहीं देने का फैसला लिया जाए।इस अधिसूचना के अन्तर्गत ही प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरणीय जन सुनवाई जैसा महत्वपूर्ण प्रावधान रखा गया है।किसी भी परियोजना को मंजूरी देने से पहले उसके प्रभावों को पैनी नजर से आंकने और जांचने के रास्ते भी खुले और निर्णय प्रकिया में जनता की भूमिका भी बढी।इस प्रकिया में परियोजना चार चरणों से गुजरती है।जब परियोजना निर्माता आवेदन करता है, उसे टर्म्स ऑफ रेफरेंस प्रतीक्षारत अवस्था कहते हैं।इसके बाद एक विशेषज्ञ आकलन समिति द्वारा परियोजना की छानबीन की जाती है।छानबीन के अन्तर्गत पर्यावरण प्रभाव आंकलन हेतु बिंदु (टर्म्स ऑफ रेफरेंस) तैयार किए जाते हैं।इसी के साथ परियोजना टर्म्स ऑफ रेफरेंस स्वीकृत अवस्था में आ जाती है।पर्यावरण प्रभाव आंकलन का मसौदा तैयार होने के बाद जन सुनवाई आयोजित की जाती है और उसके बाद पर्यावरण प्रभाव आकलन प्रतिवेदन तथा पर्यावरण प्रबंधन योजना को अंतिम रूप दिया जाता है।ये सारे चरण पुरा होने के बाद रिपोर्ट पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को प्रस्तुत की जाती है।यह अवस्था पर्यावरण मंजूरी प्रतीक्षारत अवस्था है।इसके उपरांत विशेषज्ञ आकलन समिति द्वारा सबंधित दस्तावेजों की छानबीन की जाती है और परियोजना को स्वीकृत या ख़ारिज की करने की सिफारिश करती है।एक बार पर्यावरण मंजूरी मिल जाने के बाद परियोजना पर्यावरण मंजूरी अवस्था में आ जाती है।
 
पूंजी एवं कम्पनीयों के सामने झुकने वाली सरकार की मंशा विपरित होने के कारण 1994 से 2006 तक 12 सालों में 13 बार संशोधन किया गया।14 सितम्बर 2006 को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा 1994 के नोटीफिकेशन को बदल कर पर्यावरण प्रभाव निर्धारण प्रकिया 2006 बनाया गया।यह व्यवस्था भी वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा विश्व बैंक की मदद से चलाए गए ” पर्यावरण प्रबंधन दक्षता विकास कार्यक्रम ” के आधार पर लाया गया।जिसमें कम्पनियों द्वारा परियोजना को स्वीकृति देने की प्रकिया को शीघ्र और सरकारी नियंत्रण को सरल करने जैसे सुझाव को शामिल कर लिया गया।जबकि स्वीकृति प्रकिया में शर्तो की मानिटरिंग तथा शर्तो की कार्य योजना महत्वपूर्ण है। लेकिन 2006 का नोटीफिकेशन अधिक जोर नहीं देता है।केवल इतना ही कहा गया है कि छ: मासिक प्रतिवेदन देना होगा।प्रकिया कमजोर करने के बावजूद लोग आज भी उस जन सुनवाई में विरोध करने जाते हैं।
 

पूरी प्रक्रिया मात्र कागजी खानापूर्ति

किसी भी औद्योगिक, खनन, पावर प्लांट, बांध या बुनियादी ढाचे की परियोजना से पर्यावरण को कितना नुकसान होगा, उसका मूल्यांकन किया जाए और नुकसान को कम करने के लिए शर्तें लगाई जाएं। लेकिन व्यवहार में अक्सर यह प्रक्रिया जनहित से ज्यादा कॉर्पोरेट हितों की ओर झुकी हुई दिखती है।कानून कहता है कि प्रभावित लोगों से जन-सुनवाई करनी होगी। हकीकत यह है कि ग्रामीणों, आदिवासियों और अन्य लोगों की राय को या तो रिकॉर्ड में ही बदल दिया जाता है या दबाव डालकर समर्थन दिखा दिया जाता है। पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट अक्सर प्रोजेक्ट प्रायोजक की कंसल्टेंसी एजेंसियां बनाती हैं। रिपोर्टें में प्रायः कॉपी-पेस्ट, अधूरी या झूठी होती हैं—नदी, वन्यजीव, भूजल, प्रदूषण पर सही डेटा ही नहीं होता।
 
कई बार परियोजना को कम नुकसानदायक दिखाने के लिए जानबूझकर आंकड़े घटाए-बढ़ाए जाते हैं।मंजूरी मिलने के बाद कंपनियां जो पर्यावरणीय शर्तें मानने का वादा करती हैं (जैसे–पेड़ लगाना, धूल नियंत्रण, नदी संरक्षण), उनकी निगरानी शायद ही कभी होती है।
 
राज कुमार सिन्हा I बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ
 

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