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22 अप्रैल विश्व पृथ्वी दिवस पर विशेष

पृथ्वी मनुष्य जाति का निवास स्थान है।यह एक ऐसा ग्रह है जहां जीवन है। यही पृथ्वी प्रकृति है। प्रकृति ही मनुष्य जाति के लिए जीने की चीजें जुटाती है। किन्तु आज पृथ्वी का‌ पर्यावरण खतरे में है। हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं जब संपूर्ण पारिस्थितिकी विनाश की संभावना के बारे में चर्चा करना जरूरी है। हमारी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था, मानव स्वतंत्रता और प्रकृति के साथ मानवीय संबंध यांत्रिक दृष्टिकोण में उलझी हुई है, जो सीधे तौर पर पारिस्थितिक अनिवार्यता के विपरीत है। हम जीवित हैं क्योंकि प्रकृति जीवित है। पृथ्वी हमें जीवन देती है। हम पृथ्वी का अभिन्न अंग हैं क्योंकि हम सांस, पानी और पोषण जैसी जीवनदायी चीजों के माध्यम से गहराई से जुड़े हुए हैं। चूंकि हम जीवनयापन के लिए प्रकृति पर निर्भर हैं, इसलिए प्रकृति का विनाश भोजन और पानी, जीवन और आजीविका के मानव अधिकारों का उल्लंघन है। हम प्रकृति को अधिकार नहीं देते। धरती माता के अपने अधिकार हैं। हमें उनके नियमों को पहचानना और उनके अनुसार जीवन जीना होगा। वैश्विक प्रकृति संरक्षण सूचकांक 2024’ की रिपोर्ट में 180 देशों में भारत को 176 वें स्थान पर रखा गया है। भारत का सबसे निचले स्थान पर होना मुख्य रूप से अकुशल भूमि-प्रबंधन और जैव-विविधता पर बढ़ते खतरों के कारण है।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि पृथ्वी की जीवन-सहायक प्रणालियां इतनी क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं कि यह ग्रह अब असुरक्षित होता जा रहा है। वैज्ञानिकों के आकलन के अनुसार, मानव-जनित प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के विनाश के कारण नौ में से छह “ग्रहीय सीमाएं” टूट चुकी हैं। ये सीमाएं जलवायु, जल और जैव-विविधता जैसी प्रमुख वैश्विक प्रणालियों से जुड़ी हैं, जो पृथ्वी को स्वस्थ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इन सीमाओं के टूटने का अर्थ है कि पृथ्वी उस सुरक्षित और स्थिर अवस्था से बहुत दूर जा चुकी है, जो लगभग 10,000 वर्ष पूर्व अंतिम हिमयुग के अंत से लेकर औद्योगिक क्रांति के प्रारंभ तक विद्यमान थी। पिछले 50 वर्षों में पृथ्वी से आधे से अधिक पक्षी, स्तनधारी, सरीसृप, उभयचर और मछलियां लुप्त हो चुकी हैं। वर्तमान में विलुप्त होने की दर मानव-पूर्व काल की तुलना में 100 से 1000 गुना अधिक है, जो डायनासोर के विलुप्त होने के बाद से सबसे बड़ी विलुप्ति घटना मानी जा रही है। इसका सीधा प्रभाव हमारी खाद्य और जल सुरक्षा पर पड़ रहा है, साथ ही यह हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बनता जा रहा है।स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट 2025 के अनुसार पृथ्वी का मौसम अब तक के देखे गए इतिहास में किसी भी समय की तुलना में कहीं ज्यादा असंतुलित हो गया है, ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा के कारण वायुमंडल और महासागर लगातार गर्म हो रहे हैं और बर्फ पिघल रही है। इस रिपोर्ट में पहली बार, पृथ्वी के ‘ऊर्जा असंतुलन’ को जलवायु के प्रमुख संकेतकों में से एक के रूप में शामिल किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, अब पृथ्वी की ऊर्जा में असंतुलन पिछले 65 सालों के रिकॉर्ड में सबसे ज्यादा है।

पारिस्थितिकी विज्ञान और प्राचीन ज्ञान दोनों ही हमें सिखाते हैं कि समस्त जीवन मिट्टी पर निर्भर करता है। जीवित मिट्टी एक जटिल खाद्य श्रृंखला है जो जीवन से भरपूर है। मिट्टी में मौजूद यही जीवन मिट्टी की उर्वरता को पुनर्जीवित करता है और पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराता है, जिससे हमारी कृषि को सहारा मिलता है। कृषि क्षेत्र ‘ग्रीनहाउस गैसों’ का एक प्रमुख स्रोत बन चुका है, जिससे भविष्य में खाद्य सुरक्षा पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को कम या बंद करने से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाया जा सकता है। इसके विकल्प के रूप में ‘प्राकृतिक खेती’ एक प्रभावी समाधान प्रस्तुत करती है। प्राकृतिक खेती से मिट्टी की जल-धारण क्षमता बढ़ती है, जिससे जल-संरक्षण होता है और सूखा व बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं के प्रति लचीलापन भी बढ़ता है। यह जैव-विविधता को बढ़ावा देती है और फसलों को जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक प्रतिरोधी बनाती है। विविध फसलों की खेती मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है तथा कीटों और बीमारियों को नियंत्रित करने में सहायक होती है। धरती की ‘किडनी’ कहे जाने वाले वेटलैंड (आर्द्रभूमि) आज उपेक्षा का शिकार हैं। गांवों और शहरों में इन आर्द्रभूमियों को पाटकर खेती और आवास के लिए उपयोग किया जा रहा है। जबकि ताल-तलैया, जलाशय और तटीय क्षेत्र न केवल हजारों जैविक इकाइयों का आश्रय हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आर्द्रभूमियां कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर तापमान को कम करने और प्रदूषण घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। दलदली भूमि की कार्बन अवशोषण क्षमता जंगलों की तुलना में लगभग दोगुनी होती है। पृथ्वी की अर्थव्यवस्था पर भी इस संकट का गहरा प्रभाव पड़ रहा है। धरती को बर्बाद करता प्लास्टिक का 99 प्रतिशत से अधिक उत्पादन जीवाश्म ईंधनों जैसे तेल और गैस से किया जाता है, जिससे हमारे रोजमर्रा के प्लास्टिक उपयोग का सीधा संबंध खनन एवं उत्खनन उद्योगों, बढ़ते उत्सर्जन, प्रदूषण और पर्यावरणीय अन्याय से जुड़ जाता है। प्लास्टिक के पूरे जीवनचक्र कच्चे संसाधनों के उत्खनन और उत्पादन से लेकर उपयोग के बाद निपटान तक का अध्ययन यह दर्शाता है कि औद्योगिक और नीतिगत निर्णय इन प्रभावों को किस प्रकार आकार देते हैं। समुद्र पृथ्वी की सतह का 71 प्रतिशत भाग घेरते हैं, जबकि मात्र एक चौथाई भूमि ही हमारे प्रत्यक्ष उपयोग में आती है। इसके बावजूद हम प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक और असंतुलित दोहन कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक कोरी ब्रैडशॉ के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि मानव आबादी पृथ्वी की दीर्घकालिक वहन क्षमता से अधिक हो चुकी है। इस अध्ययन में दो शताब्दियों के जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि वर्तमान उपभोग स्तरों के साथ पृथ्वी मानवता को स्थायी रूप से सहारा नहीं दे सकती। पृथ्वी प्रणाली की स्थिरता, लचीलापन और मानव कल्याण आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं, लेकिन इस परस्पर निर्भरता को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। यदि संसाधनों का न्यायपूर्ण और संतुलित उपयोग किया जाए, तो सभी के लिए गरीबी उन्मूलन और पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
सभी के लिए संसाधनों की उपलब्धता और पृथ्वी की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि आर्थिक और तकनीकी बदलावों के साथ-साथ जल और पोषक तत्वों जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों तक पहुंच में असमानताओं को कम किया जाए। “सुरक्षित और न्यायसंगत स्थान” की अवधारणा इसी दिशा में एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करती है।

महात्मा गांधी के विचार आज भी इस संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हैं। उनका मानना था कि मनुष्य को प्रकृति से केवल अपनी आवश्यकताओं के अनुसार ही लेना चाहिए, न कि लालच या अति-उपभोग के आधार पर। उन्होंने सादगी, आत्मसंयम और संतुलित जीवनशैली को महत्व दिया। गांधी ने अंधाधुंध औद्योगिकीकरण और मशीनों पर अत्यधिक निर्भरता के प्रति चेतावनी दी थी। वे ‘स्वदेशी’ और ‘ग्राम स्वराज’ के समर्थक थे, जहां स्थानीय संसाधनों का टिकाऊ उपयोग ही समाज और पर्यावरण दोनों के लिए हितकारी होता है। “कम से कम लेना और ज्यादा से ज्यादा देना” सतत विकास का मूल मंत्र है—ऐसा विकास जिसमें पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बना रहे। प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीना कोई नया विचार नहीं है। आदिवासी समुदाय सदियों से इस जीवनशैली का पालन करते आए हैं। वे प्रकृति के चक्रों और संतुलन को समझते हैं और केवल उतना ही लेते हैं जितना आवश्यक होता है, बाकी प्रकृति के लिए छोड़ देते हैं। परिस्थितियां यह सोचने पर मजबूर करता है कि पृथ्वी को बचाने के लिए हमें अपने जीवन के तरीके, उपभोग के पैटर्न और विकास की दिशा में तत्काल बदलाव लाने होंगे। प्रकृति के विरुद्ध हिंसा और पारिस्थितिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन को अंतर्राष्ट्रीय कानून में पारिस्थितिक विनाश के अपराध के रूप में परिभाषित करने के लिए एक आंदोलन जोर पकड़ रहा है। दुनिया भर में लोग पारिस्थितिक तंत्रों को होने वाले नुकसान और विनाश को रोकने के लिए कदम उठा रहे हैं, जो मनुष्यों सहित प्रजातियों के स्वास्थ्य और कल्याण को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

राज कुमार सिन्हा । बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

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