भारत में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की बहस लंबे समय से चल रही है। सड़क, बांध, खनन, ताप विद्युत संयंत्र, औद्योगिक परियोजनाओं और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों जैसी बड़ी परियोजनाओं को आर्थिक विकास का आधार बताया जाता है, लेकिन इनके निर्माण से पहले पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन और संभावित नुकसान से बचाव भी कानून की अनिवार्य मांग है। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला पर्यावरणीय शासन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यायालय ने केंद्र सरकार के 7 जुलाई 2021 के उस कार्यालय ज्ञापन (ऑफिस मेमोरेंडम) को निरस्त कर दिया, जिसके जरिए उन परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया उपलब्ध कराई गई थी, जो आवश्यक पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी हासिल किए बिना निर्माण या संचालन शुरू कर चुकी थीं। तीन सदस्यीय पीठ में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली शामिल थे। यह फैसला मूलतः इस सवाल से जुड़ा है कि क्या कार्यपालिका महज एक प्रशासनिक कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से उस कानूनी व्यवस्था को बदल सकती है, जिसके तहत किसी परियोजना को शुरू करने से पहले पर्यावरणीय मंजूरी लेना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट का उत्तर स्पष्ट है कि किसी वैधानिक व्यवस्था को महज प्रशासनिक आदेश के जरिए कमजोर या प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 के तहत निर्धारित परियोजनाओं के लिए निर्माण शुरू करने अथवा परियोजना का विस्तार करने से पहले पर्यावरणीय स्वीकृति लेना आवश्यक है। इसका उद्देश्य केवल सरकारी अनुमति हासिल करना नहीं है, बल्कि परियोजना के संभावित पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का पहले से आकलन करना है।
किसी बड़े बांध से कितने गांव प्रभावित होंगे, जंगल का कितना हिस्सा डूबेगा, नदी के प्रवाह और जैव-विविधता पर क्या असर पड़ेगा, खनन परियोजना से भूजल और कृषि भूमि पर क्या प्रभाव पड़ेगा, औद्योगिक परियोजना से प्रदूषण का स्तर कितना बढ़ सकता है अथवा किसी परमाणु परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय जोखिम क्या हैं। इन सभी सवालों का मूल्यांकन परियोजना शुरू होने से पहले होना चाहिए। यही पूर्व मूल्यांकन पर्यावरणीय कानूनों की मूल भावना है। यदि परियोजना पहले शुरू कर दी जाए और पर्यावरणीय मंजूरी बाद में मांगी जाए तो पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन अक्सर एक ऐसी स्थिति में होता है, जब नुकसान हो चुका होता है या परियोजना को रोकना व्यावहारिक और राजनीतिक रूप से कठिन बना दिया जाता है। इसलिए ‘पहले निर्माण, बाद में मंजूरी’ की व्यवस्था पर्यावरणीय कानून के निवारक चरित्र को कमजोर करती है। 7 जुलाई 2021 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ऐसा कार्यालय ज्ञापन जारी किया था, जिसमें उन परियोजनाओं से संबंधित प्रक्रिया निर्धारित की गई थी जिन्होंने आवश्यक पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी के बिना निर्माण या संचालन शुरू कर दिया था। आलोचकों का तर्क था कि इस तरह की व्यवस्था से परियोजना संचालकों को गलत प्रोत्साहन मिलता है। यदि कोई कंपनी बिना मंजूरी के परियोजना शुरू कर देती है और बाद में जुर्माना, क्षतिपूर्ति अथवा कुछ शर्तों के साथ पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त कर सकती है, तो कानून का पूर्व-अनुमति वाला ढांचा कमजोर पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी बिंदु पर हस्तक्षेप करते हुए 2021 के कार्यालय ज्ञापन को निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने माना कि 2006 की पर्यावरणीय प्रभाव अधिसूचना व्यवस्था में पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी की जो वैधानिक आवश्यकता है, उसे केवल प्रशासनिक आदेश से बदला नहीं जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि केंद्र सरकार किसी भी परिस्थिति में पोस्ट-फैक्टो पर्यावरणीय मंजूरी की व्यवस्था नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि यदि विशेष परिस्थितियों में ऐसी व्यवस्था करनी है तो उसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के तहत वैधानिक अधिसूचना के माध्यम से किया जाना होगा। केवल कार्यालय ज्ञापन जारी करके वैधानिक पर्यावरणीय व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता है।
यानी अदालत ने कार्यपालिका की शक्ति को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, बल्कि उसके इस्तेमाल के लिए संवैधानिक और वैधानिक रास्ता स्पष्ट किया है। यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि भविष्य में यदि केंद्र सरकार किसी विशेष परिस्थिति में ऐसी व्यवस्था करना चाहती है तो उसे पारदर्शी, वैधानिक और विधि-सम्मत प्रक्रिया अपनानी होगी। प्रशासनिक स्तर पर जारी एक साधारण कार्यालय आदेश के जरिए पर्यावरण कानून की मूल शर्त को कमजोर नहीं किया जा सकता है।
पर्यावरणीय कानूनों में बार-बार ऐसी व्यवस्थाएं सामने आती रही हैं जिनमें नियमों का उल्लंघन कर चुकी परियोजनाओं को बाद में नियमित करने का रास्ता उपलब्ध कराया जाता है। इससे एक गंभीर सवाल उठता है कि जो परियोजना कानून का पालन करके आगे बढ़ी और जिसने पर्यावरणीय स्वीकृति की लंबी प्रक्रिया पूरी की, उसकी तुलना में नियमों का उल्लंघन करने वाली परियोजना को बाद में राहत देना क्या न्यायसंगत है? इसीलिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल एक कार्यालय ज्ञापन को निरस्त करने तक सीमित नहीं है। यह शासन-व्यवस्था को यह संदेश देता है कि पर्यावरणीय कानूनों का उल्लंघन करके परियोजना खड़ी करना कोई सामान्य प्रशासनिक कमी नहीं माना जा सकता। इस फैसले का महत्व मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में और बढ़ जाता है, जहां बड़े बांध, खनन, ताप विद्युत, औद्योगिक परियोजनाओं तथा प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणीय और सामाजिक विवाद सामने आते रहे हैं। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के मामले में पर्यावरणीय प्रभाव का प्रश्न केवल भूमि उपयोग तक सीमित नहीं होता। जल संसाधन, जैव-विविधता, तापीय प्रभाव, रेडियोधर्मी अपशिष्ट, आपदा प्रबंधन, स्थानीय समुदायों की सुरक्षा और दीर्घकालिक पर्यावरणीय जोखिम जैसे प्रश्न भी महत्वपूर्ण होते हैं। इसी प्रकार बड़े बांधों में जंगल, नदी, कृषि भूमि, मछली संसाधन, वन्यजीव और विस्थापन जैसे अनेक प्रभाव जुड़े होते हैं। खनन परियोजनाओं में भूजल, वन क्षेत्र, कृषि और स्थानीय आजीविका प्रभावित हो सकती है। ऐसी परियोजनाओं में यदि पहले निर्माण शुरू हो जाए और पर्यावरणीय स्वीकृति बाद में मिले तो पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की पूरी अवधारणा ही कमजोर पड़ सकती है। अक्सर पर्यावरणीय मंजूरी को विकास परियोजनाओं में एक प्रशासनिक बाधा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन वास्तविकता में पर्यावरणीय मंजूरी का उद्देश्य परियोजना को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विकास पर्यावरणीय सीमाओं और कानूनी मानकों के भीतर हो। भारत के संविधान में भी पर्यावरण संरक्षण को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की न्यायिक व्याख्या स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार तक पहुंच चुकी है। वहीं अनुच्छेद 48-ए राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार तथा वनों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा का दायित्व देता है। इस दृष्टि से पर्यावरणीय कानून विकास-विरोधी नहीं हैं। वे विकास को अधिक जिम्मेदार, टिकाऊ और भविष्य की पीढ़ियों के हित में बनाने का माध्यम हैं। भारत में कई बार यह धारणा बनाई जाती है कि कोई परियोजना एक बार शुरू हो जाए तो उसे बंद करना कठिन है, क्योंकि उसमें भारी निवेश हो चुका होता है और उससे रोजगार तथा आर्थिक गतिविधियां जुड़ जाती हैं।लेकिन यदि यही तर्क स्वीकार कर लिया जाए तो कानून का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति या कंपनी को उस व्यक्ति से अधिक लाभ मिल सकता है जिसने शुरुआत से कानून का पालन किया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का महत्व इसी जगह है। न्यायालय ने संकेत दिया है कि किसी परियोजना में निवेश हो जाना अपने आप में पर्यावरणीय कानूनों के उल्लंघन का लाइसेंस नहीं बन सकता है। किसी परियोजना का आर्थिक महत्व अपनी जगह है, लेकिन पर्यावरणीय कानूनों का पालन उससे पहले की शर्त है।भविष्य की सरकारों के लिए भी स्पष्ट संदेश है कि इस फैसले का एक व्यापक संवैधानिक महत्व है। सरकारें नीतियां बना सकती हैं, प्रशासनिक निर्देश जारी कर सकती हैं और विकास परियोजनाओं के लिए प्रक्रियाएं निर्धारित कर सकती हैं। लेकिन जब किसी वैधानिक अधिसूचना द्वारा निर्धारित पर्यावरणीय सुरक्षा व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन करना हो, तो उसके लिए कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा।
इसलिए भविष्य में यदि केंद्र सरकार किसी विशेष श्रेणी की परियोजनाओं के लिए पोस्ट-फैक्टो मंजूरी या किसी प्रकार की ‘एमनेस्टी’ व्यवस्था लाना चाहती है तो उसे उचित वैधानिक अधिसूचना के माध्यम से ऐसा करना होगा। महज एक कार्यालय ज्ञापन पर्याप्त नहीं होगा। यह बात पर्यावरणीय प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों को मजबूत कर सकती है। फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि न्यायालय ने इसे इस तरह लागू नहीं किया है कि पहले से जारी मंजूरियों और चल रही परियोजनाओं में अचानक व्यापक व्यवधान पैदा हो। इसलिए 2021 के कार्यालय ज्ञापन के आधार पर पहले से दिए गए पर्यावरणीय स्वीकृति मामलों को लेकर फैसले का प्रभाव अलग तरीके से निर्धारित किया गया है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन पर्यावरण संरक्षण की वास्तविक परीक्षा इसके बाद शुरू होती है।
अब केंद्रीय और राज्य सरकारों, पर्यावरण मंत्रालयों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों तथा संबंधित नियामक संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई परियोजना आवश्यक पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति के बिना निर्माण या संचालन शुरू न करे। सिर्फ कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। उसकी निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही आवश्यक है।
स्थानीय समुदायों, ग्राम सभाओं, पर्यावरण संगठनों और प्रभावित नागरिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। किसी परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों की वास्तविक जानकारी अक्सर उन्हीं समुदायों के पास होती है जो उसके आसपास रहते हैं। इसलिए पर्यावरणीय निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की भागीदारी और सूचना तक उनकी पहुंच को मजबूत करना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत के पर्यावरणीय कानूनों के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और नीतिगत संदेश लेकर आया है। पर्यावरणीय स्वीकृति कोई औपचारिकता नहीं है जिसे परियोजना शुरू होने के बाद पूरा किया जा सके। इसका उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि पर्यावरणीय नुकसान की आशंका का आकलन नुकसान होने से पहले किया जाए और आवश्यक सुरक्षा उपाय परियोजना शुरू होने से पहले तय किए जाएं। आने वाले समय में इस फैसले की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि सरकारें और परियोजना प्राधिकरण इसे केवल न्यायिक आदेश के रूप में देखते हैं या विकास की पूरी प्रक्रिया में पर्यावरणीय जवाबदेही के अनिवार्य सिद्धांत के रूप में स्वीकार करते हैं।कानून का अर्थ यही है कि विकास पर्यावरण की कीमत पर नहीं, बल्कि पर्यावरणीय न्याय और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए हो।
राज कुमार सिन्हा । बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ
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