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पंचायती राज दिवस (24 अप्रेल) पर विशेषसत्ता

महात्मा गांधी ने स्वराज के बारे में चार बातें कही। एक, आत्म शासन और आत्म संयम। दो, स्वराज से मेरा अभिप्राय है लोक सहमति से चलने वाला भारत वर्ष का शासन। तीन, हमारी शासन पद्धति गांव की प्रकृति के अनुरूप होनी चाहिए। चार, स्वराज ही राम राज्य है।

महात्मा गांधी अपने को ग्रामवासी ही मानते थे और गांव में ही बस गये थे। गांव की जरुरतें पूरी करने के लिये उन्होंने अनेक संस्थाएं कायम की थी। उनका दृढ़ विश्वास था कि गांवों की स्थिति में सुधार करके ही देश को सभी दृष्टि से अपराजेय बनाया जा सकता है। ब्रिटिश सरकार द्वारा गांवों को पराधीन बनाने का जो षड्यंत्र किया गया था। उसे समझकर ही वे ग्राम उत्थान को सब रोगों की दवा मानते थे।इसलिये संविधान में अनुच्छेद- 40 के अंतर्गत गांधी जी की कल्पना के अनुसार ही ग्राम पंचायतों के संगठन की व्यवस्था की गई। संविधान में ग्राम पंचायतों के संगठन संबंधी अनुच्छेद – 40 में निर्देश है कि- “राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठाएगा और उसको ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाईयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों”। बलवंत राय मेहता को पंचायती राज का जनक माना जाता है। बलवंत राय मेहता समिति की स्थापना 1950 के दशक में आधुनिक भारत में पंचायती राज व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करने के उद्देश्य से की गई थी।पंचायत की भूमिका निर्णय लेना, आर्थिक पहल शुरू करना और आम तौर पर स्थानीय स्तर पर प्रशासन में शामिल होना है। सरकार का ऐसा विकेंद्रीकृत स्वरूप गरीबी दूर करने और स्वशासन को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था।लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का अर्थ है कि शासन-सत्ता को एक स्थान पर केंद्रित करने के बजाय उसे स्थानीय स्तरों पर विभाजित किया जाए, ताकि आम आदमी की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित हो सके और वह अपने हितों व आवश्यकताओं के अनुरूप शासन-संचालन में अपना योगदान दे सके। स्वतंत्रता के पश्चात् पंचायती राज की स्थापना लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की अवधारणा को साकार करने के लिये उठाए गए महत्त्वपूर्ण कदमों में से एक थी।

संविधान के अनुच्छेद 243(क) के अनुसार ग्राम सभा स्तर पर ऐसी शक्तियों का प्रयोग एवं ऐसे कृत्यों का पालन कर सकेगी, जो किसी राज्य विधान मंडल द्वारा,उपबंधित किये जाए।संविधान के अनुच्छेद 243ए से अनुच्छेद 243जी तक निर्दिष्ट कार्यों, पदाधिकारियों और वित्त से संबंधित मामले राज्यों के विवेक पर छोड़ दिए गए थे, जो इन सभी पहलुओं के संबंध में प्रावधान करते हुए राज्य पंचायत कानूनों में संशोधन या अधिनियमन करेंगे।

वर्ष 1993 में संविधान के 73वें संशोधन द्वारा पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता मिली थी। इसका उद्देश्य देश की करीब ढाई लाख पंचायतों को अधिक अधिकार प्रदान कर उन्हें सशक्त बनाना था और यह उम्मीद थी कि ग्राम पंचायतें स्थानीय ज़रुरतों के अनुसार योजनाएं बनाएंगी और उन्हें लागू करेंगी।संविधान की अनुसूची -11 में 29 विषय सूचीबद्ध हैं जो स्थानीय विषय के मामले हैं, जो लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। समुदाय, या विशेष रूप से ग्राम सभा से इन मामलों के संबंध में योजना और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग लेने की अपेक्षा की गई है।

पंचायती राज प्रणाली का आधुनिक उद्देश्य क्षेत्रों को अपने आर्थिक विकास की योजना बनाने और सामाजिक न्याय नीतियों को लागू करने की क्षमता प्रदान करना है।
भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की है। यह 2024 के अध्ययन पर आधारित है। देश भर में पंचायतें कैसा कार्य कर रही हैं? पंचायती राज मंत्रालय ने जो अध्ययन कराया है वह यह जानने का प्रयास है कि क्या उस संवैधानिक व्यवस्था को राज्य सरकारों ने कितनी गंभीरता, पारदर्शिता और जवाबदेही से अपने यहां लागू किया है। इस अध्ययन से यह स्पष्‍ट हुआ है कि मंजिल अभी दूर है। वह बहुत दूर है। क्या इसलिए है कि सरकारें उदासीन हैं? क्या इसलिए है कि शासन तंत्र नहीं चाहता कि पंचायत प्रणाली प्रभावी बने? पंचायती राज व्यवस्था ने अपने उद्देश्यों को पूरा करने में कुछ हद तक सफलता हासिल की है, लेकिन इसमें सुधार की ज़रूरत भी है।

आज लगभग पूरे देश में पंचायती राज व्यवस्था मौजूद है, लेकिन हकीकत में आज आत्मनिर्भरता उस स्थिति से कोसों दूर है, जिसकी कल्पना इसके लागू होने के समय की गई थी। महिलाएं इसका पूरा लाभ नहीं उठा पाईं, साथ ही निम्न वर्ग भी इसका लाभ नहीं उठा पाया, क्योंकि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान कई तरह की पक्षपातपूर्ण प्रवृत्तियों से प्रेरित होता है। जब पंचायती व्यवस्था सुदृढ़ और आत्मनिर्भर बनेगी, तभी भारत का लोकतंत्र मजबूत होगा।

पंचायती राज के तहत 33 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण दिया गया है। लेकिन आज भी निर्वाचित महिला प्रतिनिधि परिवार के लोगों के सलाह पर काम करती हैं। ग्राम स्तर के विवादों को सुलझाने का दायित्व सरपंच को दिया गया है।परन्तु ग्राम न्यायालय ठीक तरीके से संचालित नहीं होने के कारण लोग कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाने मजबूर हैं।

पंचायती राज संस्थाओं को पर्याप्त वित्त पोषण न मिलने और राजनीतिक दलों के हस्तक्षेप की वजह से इनकी कार्यप्रणाली प्रभावित होती है।
देश के किसी भी विधान मंडल ने ग्राम सभा यानी गांव समाज को कोई भी शक्ति देने लायक नहीं समझा। इससे साफ है कि मन से तो देश के सभी विधानमंडल संसद की संयुक्त समिति के सोच से ही सहमत थे कि ग्राम सभा को कोई शक्ति नहीं दी जा सकती है।

“पिता(गांव समाज)की बात पर विचार, नौकरशाही की आज्ञा का पालन। यही है पंचायत राज की आदर्श व्यवस्था का अनुपम सार।।”

विकसित भारत ही उन्नत भारत होगा। ऐसे भारत का आधार ग्राम स्वराज्य ही होगा। यह कोई कल्पना नहीं है, बल्कि भारत का एक ऐतिहासिक यथार्थ है।

राज कुमार सिन्हा | बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

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