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साल 2015 में लॉन्च किए जाते समय ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ का उद्देश्य 100 शहरी क्षेत्रों का चयन करके उनके बुनियादी ढांचे को चमकदार बनाया जाना और निवासियों को बेहतर प्रशासनिक दक्षता उपलब्ध करवाने में सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग प्रस्तावित था। ‘शहरी विकास मंत्रालय’ ने 20 वर्षों की इसकी लागत 7 लाख करोड़ रुपये बताई थी। इस मिशन के लिए चुने गए शहरों में नई दिल्ली से लेकर भोपाल, भागलपुर, इंदौर, इंफाल, सलेम, सतना और अहमदाबाद आदि शामिल थे।

केंद्र सरकार ने प्रारंभ में मिशन के लिए 48,000 करोड़ रुपये आवंटित किए थे। इसमें कुछ राशि उन राज्यों द्वारा भी मिलाई जानी थी जिनमें परियोजनाएं लागू की जानी थीं। मिशन ने यह सिफारिश की थी कि जलापूर्ति, स्वच्छता, सीवरेज और परिवहन जैसी सार्वजनिक सेवाएं निजी साझेदारों के माध्यम से ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ (पीपीपी) के तहत प्रदान की जाएं।

1990 के दशक की शुरुआत में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के बाद से भारत का शहरी विकास मॉडल निजी कंपनियों को सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता में शामिल करने और फिर नागरिकों से उनका शुल्क वसूलने की रणनीति पर आधारित रहा है। ‘पीपीपी’ की इस रणनीति के तहत निजी क्षेत्र को अवसर प्रदान करने और इन परियोजनाओं को लागू करने के लिए धन उपलब्ध करवाने के साधन के रूप में बढ़ावा दिया गया।

सरकार की ‘इंडिया इन्वेस्टमेंट ग्रिड’ वेबसाइट पर सैकड़ों परियोजनाएं सूचीबद्ध हैं, जिन्हें ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ के तहत इसी मॉडल में लागू करने का प्रस्ताव है। 2015-16 के वित्तीय वर्ष के पांच वर्षों में, केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ के तहत शहरों द्वारा प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए लगभग  96,000 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए थे। चुने गए शहरों की नगर निगम केंद्र और राज्य सरकारों के योगदान से अधिक होने वाले खर्चों को पूरा करने में मुख्य भूमिका निभाती हैं। संपत्ति, मनोरंजन, विज्ञापन और शहर में प्रवेश पर कर बढ़ाकर परियोजनाओं के लिए धन जुटाने की उनसे अपेक्षा की जाती है। इसके अतिरिक्त, ‘चौदहवें वित्त आयोग’ ने खाली जमीन और सार्वजनिक परिवहन पर कर लगाने और जल, बिजली, दूरसंचार, गैस, पार्किंग शुल्क और भूमि व भवन उपयोग में बदलाव पर शुल्क बढ़ाकर धन जुटाने की सिफारिश की थी।

अन्य स्रोतों में ‘नगरपालिका बॉन्ड,’ ‘ग्रीन बॉन्ड,’ ‘ऊर्जा संरक्षण बॉन्ड,’ वित्तीय संस्थानों तथा द्विपक्षीय और बहुपक्षीय एजेंसियों से पूंजी प्राप्त करना शामिल है। जब निवेशक बॉन्ड खरीदते हैं, तो वे जारीकर्ता को पैसा उधार देते हैं, जो सरकार, नगर निगम के लिए हो सकता है। यह तरीका कई स्रोतों से धन एकत्रित कर परियोजनाओं को वित्तपोषित करता है, जैसे उन नगरपालिकाओं के लिए जिनमें धन जुटाने की क्षमता नहीं है। इससे लागत कम हो सकती है और बुनियादी ढांचे तथा विकास परियोजनाओं के लिए पूंजी आसान हो सकती है।

दुनिया भर के शहरों ने सार्वजनिक नागरिक सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए डिजिटल तकनीकों का उपयोग किया है। हेलसिंकी, सिंगापुर और एम्स्टर्डम उन शहरों में शामिल हैं जो डिजिटलाइजेशन और ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ तकनीक का उपयोग करके सेवाएं प्रदान करते हैं। यह एक ऐसा नेटवर्क है जिसमें सेंसर वाले उपकरण अन्य सिस्टम के साथ जानकारी का आदान-प्रदान करते हैं, ताकि डेटा-आधारित निर्णय लेने में सुधार हो सके।

‘स्मार्ट सिटी परियोजनाओं’ के प्रमुख सहयोगी बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशन्स और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान भी रहे हैं। उनमें ‘सिस्को,’ ‘आईबीएम,’ ‘जनरल इलेक्ट्रिक,’ ‘हिताची’ और ‘तोशिबा’ आदि शामिल हैं। ऐसी स्मार्ट परियोजनाओं का उत्साहपूर्वक साथ देने वाले अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान भी हैं, जैसे ‘वर्ल्डबैंक,’ ‘एशियन डेवलपमेंट बैंक’ और कई ‘इंटरनेशनल फाइनेंस कॉर्पोरेशन।’ भारत के ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ को ‘वर्ल्डबैंक’ के अलावा ‘इंटरनेशनल फाइनेंस कॉर्पोरेशन’ का सहयोग प्राप्त है जो ‘वर्ल्डबैंक’ समूह की निजी क्षेत्र की शाखा है और लाभकारी व वाणिज्यिक परियोजनाओं में निवेश करके आर्थिक विकास को आगे बढ़ाती है।

वहीं, ‘एशियन डेवलपमेंट बैंक’ अपने शहरी कार्यक्रमों के लिए ‘अर्बन फाइनेंसिंग पार्टनरशिप फेसिलिटी’ और ‘वाटर फाइनेंसिंग पार्टनरशिप फेसिलिटी’ के तहत धन का उपयोग कर रहा है। इसकी ‘सिटीज डेवलपमेंट इनिशिएटिव फॉर एशिया’ शहरों को उनकी क्षमताओं के निर्माण और परियोजना तैयारी तथा कार्यान्वयन में सहयोग करती है। इसका ‘अर्बन क्लाइमेट चेंज रेसिलियेंस ट्रस्ट’ फंड शहरों को उनकी योजना और संचालन में जलवायु परिवर्तन प्रतिरोधी सिद्धांतों को शामिल करने की क्षमताओं का निर्माण करता है। ‘एशियन डेवलपमेंट बैंक’ ने बेंगलुरु, आइज़ॉल, अगरतला और त्रिपुरा जैसे स्मार्ट शहरों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की है। इसने एक कार्यक्रम भी शुरू किया है जिसे शहरी भारत में जलवायु परिवर्तन प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना कहा जाता है।

अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, सिंगापुर और फ्रांस जैसे देशों की सरकारों द्वारा समर्थित द्विपक्षीय एजेंसियों ने भारतीय नगरपालिकाओं और ‘आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय’ के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। भुवनेश्वर, कोच्चि, कोयंबटूर और अजमेर उन शहरों में शामिल हैं जो द्विपक्षीय एजेंसियों के साथ स्मार्ट सिटी परियोजनाओं को विकसित, लागू और वित्तपोषित करने के लिए समझौते कर चुके हैं। हालांकि, पिछले दो दशकों में भारत का निजी ऑपरेटरों के माध्यम से परियोजनाओं को लागू करने और सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करने का अनुभव उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है।

जलापूर्ति में पांच ‘पीपीपी’ के वर्ल्डबैंक के अध्ययन ने चेतावनी दी है कि ‘सिर्फ ऐसे निवेश ही प्रभावी नहीं होंगे जिनमें कम जवाबदेही हो; आपूर्ति को ठीक से चलाने और मानकों को पूरा करने की कमी हो; कमजोर वाणिज्यिक रुझान हो; बाहरी संस्थाओं द्वारा संचालन में हस्तक्षेप हो और ग्राहक सेवा, वित्तीय स्थिरता पर केंद्रित नियामक ढांचे की अनुपस्थिति हो। इसी बीच, ‘यूरोपियन नेटवर्क ऑन डॅट एंड डेवलपमेंट’ की एक रिपोर्ट ने निष्कर्ष निकाला है कि ‘पीपीपी’ मॉडल ‘कई स्तरों पर विफल रहा है,’ जिससे वित्तीय और मानवीय दोनों तरह के प्रभाव उत्पन्न हुए हैं। इसी रिपोर्ट रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि ‘पीपीपी’ की मानवीय लागत, विशेष रूप से सार्वजनिक सेवा वितरण में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसका कारण यह है कि निजी कंपनियां नागरिकों के प्रति जिम्मेदार नहीं होतीं, बल्कि अपने शेयरधारकों के प्रति जिम्मेदार होती हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा और जल जैसी सेवाओं तक पहुंच नागरिकों की भुगतान क्षमता पर निर्भर होती जा रही है, जिससे ‘अधिकार-धारियों’ को ‘उपभोक्ता’ में बदल दिया जाता है। फिर भी विवादास्पद अनुभव के बावजूद, ‘पीपीपी’ को सार्वजनिक सेवाओं को लागू करने के मॉडल के रूप में प्राथमिकता दी जाती रहती है।

गौरव द्विवेदी ‘सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी’ से जुड़े हैं और निजीकरण, ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार, विशेषकर जल और स्वच्छता पर काम कर रहे हैं।

यह लेख मूल रूप से सर्वोदय प्रेस सेवा में प्रकाशित हुआ था और आप इसे यहाँ पढ़ सकते हैं

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