By


प्रधानमंत्री के जन्मदिन, 17 सितंबर 2017 को राष्ट्र को समर्पित ‘सरदार सरोवर’ बांध अब तक अधूरे पुनर्वास के चलते कुख्यात था, लेकिन अब विस्थापन-पुनर्वास, वन और राजस्व की जमीनों की डूब और संबंधित निर्माण कार्यों के खर्चों की भरपाई के बदले ठेंगा दिखाने के गुजरात-मॉडल ने उसे हाल में और बदनाम कर दिया है। गुजरात और राजस्थान को सिंचाई तथा मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र को बिजली देने के लिए निर्मित ‘सरदार सरोवर बांध’ पर हाल में केंद्रीय गृहमंत्री और केंद्रीय जल-शक्ति मंत्री की मध्यस्थता में हुए चारों राज्यों के तथाकथित ‘वन टाइम सैटलमेंट’ पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। समझौते का अधिकृत दस्तावेज अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, जबकि मीडिया में परस्पर विरोधी समाचार आए हैं। ऐसे में आवश्यक है कि इस समझौते का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए, ताकि स्पष्ट हो सके कि कहीं मध्यप्रदेश के वैधानिक अधिकारों तथा हजारों विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के साथ समझौता तो नहीं हुआ है?

जब वर्ष 2000 तक ‘सरदार सरोवर बांध’ की ऊंचाई 90 मीटर तक सीमित थी, तब मध्यप्रदेश सरकार ने परियोजना से होने वाली क्षति के लिए 281.46 करोड़ रुपये की मांग की थी। इसके बाद बांध की ऊंचाई क्रमशः 110 मीटर, 121.92 मीटर और अंततः 2017 में 138.68 मीटर तक बढ़ा दी गई। ऊंचाई बढ़ने के साथ मध्यप्रदेश में डूब क्षेत्र लगातार फैलता गया। सन् 2019 तक 192 गांव और एक नगर पूर्ण या आंशिक रूप से प्रभावित घोषित हुए। इसके बाद 2023 में पुनरीक्षित बैकवॉटर स्तरों के आधार पर हजारों परिवारों को पुनर्वास के लिए अपात्र घोषित कर दिया गया, जिससे उनका जीवन और आजीविका गंभीर संकट में पड़ गई।

मध्यप्रदेश सरकार ने 2019–20 के आधार पर पुनर्मूल्यांकन कराया था जिसके अनुसार राज्य ने अपने दावे को बढ़ाकर 7,669 करोड़ रुपये किया था। इसमें बढ़े हुए डूब क्षेत्र, वन भूमि, शासकीय भूमि, प्राकृतिक संसाधनों तथा वर्तमान लागत का आकलन शामिल था। यह संशोधित दावा 10 फरवरी 2022 को गुजरात सरकार को विधिवत भेजा गया, किन्तु लगभग दो वर्ष बाद 21 मार्च 2024 को गुजरात सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि वह केवल 281.46 करोड़ रुपये के पुराने दावे पर ही विचार करेगी तथा 7,669 करोड़ रुपये के संशोधित दावे को स्वीकार नहीं करेगी।

मध्यप्रदेश शासन ने इसे वास्तविक क्षति की उपेक्षा तथा अपने वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन मानते हुए अस्वीकार किया। इस विवाद पर ‘नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण’ की बैठकों में लगातार चर्चा होती रही। ‘नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण’ (एनडब्ल्यूडीटी) के निर्णय के अनुसार डूब क्षेत्र की वन एवं शासकीय भूमि की भरपाई, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास का सम्पूर्ण व्यय तथा प्रभावित राज्यों के वैध अधिकारों का संरक्षण परियोजना का अनिवार्य हिस्सा है।

सर्वोच्च न्यायालय के सन् 2000 के बाद के विभिन्न निर्णयों में भी पुनर्वास को परियोजना की पूर्व-शर्त माना गया है। वर्ष 2003 में सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान तत्कालीन ‘अटॉर्नी जनरल’ ने भी स्पष्ट किया था कि भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास का संपूर्ण व्यय गुजरात द्वारा वहन किया जाएगा। इसलिए यह दायित्व केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि कानूनी बाध्यता भी है। आज भी मध्यप्रदेश के हजारों परिवार पूर्ण पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अनेक परिवारों को वैकल्पिक कृषि भूमि, मकान के भूखंड, भूखंडों का पंजीयन, आवास निर्माण अनुदान, पुनर्वास स्थलों पर मूलभूत सुविधाएं, तथा आजीविका संबंधी अधिकार प्राप्त नहीं हुए हैं।

इन्हीं शेष कार्यों के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने गुजरात से लगभग 2,900 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मांग की थी। इस विवाद को सुलझाने के लिए मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच अनेक बैठकें हुईं थीं और उनकी ‘मध्यस्थता समिति’ का संयुक्त निरीक्षण भी हुआ था। पहले समाचार आया कि गुजरात मध्यप्रदेश को 10,000 करोड़ रुपये देगा। बाद में 6 जून 2026 को खबर आई कि यह राशि घटाकर 7,388 करोड़ रुपये कर दी गई तथा 30 जून 2026 तक समझौते को अंतिम रूप देने की बात कही गई।
बाद में आई जानकारी ने पूरे घटनाक्रम को उलट दिया। दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री, केंद्रीय जलशक्ति मंत्री तथा मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की बैठक में ‘वन टाइम सेटलमेंट’ होने की घोषणा की गई जिसमें मध्यप्रदेश को गुजरात से राशि मिलने के बजाय मध्यप्रदेश को ही गुजरात को लगभग 550 करोड़ रुपये देने होंगे। महाराष्ट्र को भी लगभग 27 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा। यदि यही अंतिम समझौता है, तो यह स्वाभाविक रूप से अनेक गंभीर प्रश्न खड़े करता है। बताया जा रहा है कि यह भुगतान परियोजना लागत में राज्यों की हिस्सेदारी के पुनर्निर्धारण से जुड़ा है, लेकिन यहां भी अनेक प्रश्न हैं।

सन् 1983 में परियोजना लागत लगभग 4,200 करोड़ रुपये आंकी गई थी। ‘योजना आयोग’ द्वारा 1988 में लगभग 6,400 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए। बाद में गुजरात सरकार ने इसे 75,000 करोड़ रुपये से अधिक बताया। पूर्व मुख्यमंत्री एवं जल-विशेषज्ञ सुरेश मेहता के अनुसार यह लागत 90,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई, हालंकि यह स्पष्ट नहीं है कि लागत में किन मदों को शामिल किया गया है।

वर्षों से यह आरोप लगाया जाता रहा है कि ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी,’ पर्यटन अवसंरचना तथा उससे जुड़े विकास कार्यों के कुछ व्यय भी परियोजना लागत में जोड़े गए हैं। यदि समझौते में वास्तव में मध्यप्रदेश के 7,669 करोड़ रुपये के दावे को समाप्त कर दिया गया है, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। पहला, राज्य को वनभूमि, शासकीय भूमि और प्राकृतिक संसाधनों की क्षति की भरपाई नहीं मिलेगी। दूसरा, पुनर्वास के लिए मांगे गए लगभग 2,900 करोड़ रुपये उपलब्ध नहीं होने पर हजारों विस्थापित परिवारों के पुनर्वास कार्य वर्षों तक अधूरे रह सकते हैं।

तीसरा, राज्य सरकार को अपने संसाधनों से पुनर्वास कार्य पूरे करने पड़ सकते हैं, जिससे अन्य विकास योजनाओं पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा। चौथा, यदि कानूनी रूप से देय राशि प्राप्त किए बिना ही समझौता कर लिया गया, तो भविष्य में अंतरराज्यीय नदी परियोजनाओं में प्रभावित राज्यों के अधिकार कमजोर पड़ सकते हैं। पांचवां, इससे यह संदेश जा सकता है कि परियोजना का लाभ प्राप्त करने वाले राज्य पुनर्वास और पर्यावरणीय दायित्वों से बच सकते हैं, जबकि परियोजना का सामाजिक एवं पर्यावरणीय बोझ प्रभावित राज्यों को अकेले उठाना पड़ता है।

छठा, हजारों आदिवासी, दलित, भूमिहीन मजदूर, मछुआरे, केवट, कुम्हार तथा अन्य पारंपरिक आजीविका वाले परिवार न्यायपूर्ण पुनर्वास से स्थायी रूप से वंचित रह सकते हैं। महाराष्ट्र ने भी 6,488 हेक्टेयर वनभूमि के बदले लगभग 1,313 करोड़ रुपये, शेष पुनर्वास कार्यों के लिए 300 करोड़ रुपये तथा बिजली उत्पादन में कमी के कारण लगभग 450 करोड़ रुपये की मांग की है। वहां भी अनेक आदिवासी परिवार आज तक पुनर्वास से वंचित हैं।

मध्यप्रदेश सरकार को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि क्या 7,669 करोड़ रुपये का दावा वापस लिया गया है? क्या 2,900 करोड़ रुपये के पुनर्वास व्यय की व्यवस्था हो गई है? यदि नहीं, तो शेष पुनर्वास किस वित्तीय स्रोत से पूरा होगा? क्या ‘नर्मदा अवार्ड’ और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पूर्ण पालन हुआ है? 41 वर्षों के ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के अहिंसक संघर्ष, न्यायिक हस्तक्षेप और संवैधानिक प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप हजारों परिवारों को पुनर्वास का लाभ मिला है, किन्तु आज भी बड़ी संख्या में विस्थापित न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

यदि ‘वन टाइम सेटलमेंट’ में मध्यप्रदेश के वैध दावों की भरपाई तथा शेष पुनर्वास दायित्वों की समुचित व्यवस्था नहीं की गई है, तो यह राज्य और विस्थापितों, दोनों के हितों के प्रतिकूल है। मध्यप्रदेश सरकार को चाहिए कि वह इस समझौते को सार्वजनिक करे, विधानसभा के समक्ष रखे तथा यह सुनिश्चित करे कि राज्य के 7,669 करोड़ रुपये के वैध दावे, वन एवं सार्वजनिक संसाधनों की भरपाई और हजारों वंचित विस्थापित परिवारों के पूर्ण एवं न्यायसंगत पुनर्वास से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होगा।

राज कुमार सिन्हा । बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

Partner With Us Through Your Support

Strong democracies need financial accountability.

Behind every policy is a financial choice. CFA works to make those choices transparent and just.

Your support enables CFA to research, monitor, and speak up on how public resources are used. Together, we can ensure finance serves the public good.

Support the work—support accountability.