By

ओडिशा में बॉक्साइट खदान की प्रस्तावित परियोजना के कारण ओडिशा के रायगढ़ा और कालाहांडी ज़िलों में फैली सिजीमाली पहाड़ियां अपने अस्तित्व को बचाने की एक अहम लड़ाई लड़ रही हैं. खनिज निकालने की इस होड़ में एक तरफ आर्थिक विकास के दावे हैं, तो दूसरी तरफ स्थानीय समुदायों की अपने जंगलों, पानी के स्रोतों, रोजी -रोटी और ज़मीन से जुड़े सांस्कृतिक रिश्तों के भविष्य की कई चिंताएं हैं.

ओडिशा की सिजीमाली पहाड़ियों में खदान के विरोध में एक बैठक. (फाइल फोटो: अरेंजमेंट)

‘हमारे लिए, पहाड़ और जंगल ही सबसे बड़े देवता और गुरु है. यहीं हमने जीना सीखा है और इन्हें बचाना हमारी जिम्मेदारी है.’

सिजीमाली की पहाड़ियों के पास बसे सागाबारी गांव की सुबह, जंगल की पगडंडी से होकर युवा लड़कियों का एक समूह आम लेकर वापस लौट रहा है. मेहनत की थकान उनके चेहरे पर है, लेकिन जंगल के प्रति उनका गहरा अपनापन अलग ही झलकता है.

आज, बॉक्साइट खदान की प्रस्तावित परियोजना के कारण ओडिशा के रायगढ़ा और कालाहांडी जिलों में फैली सिजीमाली पहाड़ियों एक अहम बहस का केंद्र बन गई हैं. खनिज निकालने की इस होड़ में एक तरफ खनन और आर्थिक विकास के दावे हैं, तो दूसरी तरफ स्थानीय समुदायों की अपने जंगलों, पानी के स्रोतों, रोजी -रोटी और जमीन से जुड़े सांस्कृतिक रिश्तों के भविष्य को लेकर कई चिंताएं हैं.

2023 से ही यह आदिवासी समुदाय, इस परियोजना का लगातार विरोध कर रहे है, जब ओडिशा सरकार ने वेदांता लिमिटेड को लगभग 311 मिलियन टन बॉक्साइट भंडार के लिए 50 साल की खनन पट्टा (माइनिंग लीज) दिया था. यहां विरोध प्रदर्शन अब जीवन जीने का एक तरीका बन गया है. फर्जी ग्रामसभाओं के जरिए झूठी सहमति लेने, जंगल कटने, विस्थापन के डर और अप्रैल 2026 में सड़क निर्माण को लेकर हुई हिंसक झड़प जैसे आरोपों ने इस इलाके को एक तनावग्रस्त युद्धक्षेत्र में बदल दिया है.

इस इलाके में लगातार पुलिस की गश्त, ड्रोन की आवाज और ग्रामीणों की गिरफ्तारियों के बीच भी, स्थानीय लोग अपने खेतों, जंगलों और पुरखों की जमीन को छोड़ने से इनकार कर रहे हैं. यह रिपोर्ट रोजमर्रा की जिंदगी में रचे-बसे इसी प्रतिरोध को दिखाने की कोशिश करती है.

‘वेदांता गो बैक’ ‘अडानी गो बैक’ प्रतिरोध की दीवार पर सिजीमाली की आवाज है. (फोटो: दीपमाला पटेल)

एक बड़े संघर्ष की यह तस्वीर गांव की मिट्टी से बनी दीवार पर लिखे संदेशों में दिखती है, जो 2023 से सिजीमाली को बचाने की लड़ाई को दिखाती है. विशाल अक्षरों में लिखा है ‘वेदांता वापस जाओ’ और ‘अडानी वापस जाओ.’ ये सिर्फ नारा नहीं है. यह अपनी जमीन, जंगलों और पहाड़ों की रक्षा के लिए डटे हुए आदिवासी और ग्रामीण समुदाय के सामूहिक संकल्प को दिखाते हैं.

कांतामल गांव में ‘मां, माटी, माली सुरक्षा मंच के अध्यक्ष जयेश (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि जब 7 अप्रैल, 2026 की आधी रात को पुलिस गांव में घुसी और लोगों को उनके घरों से खींचकर ले गई, तब उन्हें एहसास हुआ कि विरोध की इस आवाज को तस्वीरों के जरिये भी दिखाना जरूरी है. आज, कांतामल गांव के हर घर की दीवार पर यह विरोध दिखाई देता है.

गांव के एक बुजुर्ग ने दीवार की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘ये सिर्फ शब्द नहीं हैं. यह हमारे दिल की आवाज हैं. जब तक हम जिंदा हैं, हम सिजीमाली को नहीं छोड़ेंगे.’ पास खड़ी एक महिला ने कहा, ‘अगर पहाड़ बचेगा, तभी पानी, जंगल और हमारी खेती भी बचेगी. अगर पहाड़ खो गया, तो हमारी जिंदगी भी खत्म हो जाएगी.’

ग्रामीणों का कहना है कि सिजीमाली की पहाड़ियां उनके लिए सिर्फ भौगोलिक बनावट नहीं हैं, बल्कि उनके पानी, जंगल, जमीन, संस्कृति और रोजगार और आजीविका की असली बुनियाद हैं. दीवार पर लिखे शब्द हर आने-जाने वाले को याद दिलाते हैं कि सिजीमाली की लड़ाई सिर्फ एक खदान परियोजना के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह उनके अस्तित्व, पहचान और भविष्य को बचाने की लड़ाई है.

सिजीमाली पहाड़ की गोद में जीवनदायिनी जलधारा. (फोटो: दीपमाला पटेल)

सिजीमाली बॉक्साइट खदान की पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अथवा एनवायरनमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट (ईआईए) रिपोर्ट बताती है कि कालाहांडी और रायगढ़ा जिलों में चार नदियां और पांच नाले हैं, जो प्रस्तावित सिजीमाली बॉक्साइट परियोजना क्षेत्र के 10 किलोमीटर के दायरे में है.

सिजीमाली में चल रहे मौजूदा संघर्ष को समझने के लिए नियमगिरि आंदोलन को याद करना जरूरी है. वेदांता रिसोर्सेज ने पहले नियमगिरि पहाड़ियों में बॉक्साइट खनन की कोशिश की थी, लेकिन डोंगरिया कोंध आदिवासी समुदाय के ऐतिहासिक विरोध के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी. पूरी दुनिया को इस संघर्ष के बारे में पता चला और यह आज भी हमारी यादों में बसा है.

हमारी पीढ़ी के कई लोगों के लिए, खासकर शहरों में पले-बढ़े लोगों के लिए, यह समझने की शुरुआत थी कि ‘विकास’ का क्या मतलब है और यह किसके लिए है. साल 2013 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि खनन शुरू करने से पहले ग्राम सभाओं की सहमति जरूरी है. इसके बाद नियमगिरि इलाके की सभी 12 ग्रामसभाओं ने सर्वसम्मति से प्रस्तावित खनन परियोजना को खारिज कर दिया. यह फैसला आदिवासियों के अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण और ग्राम सभा के संवैधानिक अधिकार के लिए ऐतिहासिक माना जाता है.

आज, सिजीमाली एक बुनियादी सवाल के केंद्र में है क्या विकास और प्रकृति संतुलन एक-साथ चल सकते हैं? इसी सवाल के इर्दगिर्द ‘पहाड़, पानी और प्रतिरोध’ की कहानी बुनी गई है.

सिजीमाली पहाड़ों में बॉक्साइट खदान के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन की एक जगह. (फाइल फोटो: मलिका सिंह)

सागाबारी के गोपाल (बदला हुआ नाम) का आरोप है कि ईआईए रिपोर्ट में सिजीमाली की इकोलॉजिकल विविधता और इकोसिस्टम, धार्मिक परम्पराओं, औषधीय पौधों से जुड़ी अहम जानकारी जानबूझकर छोड़ी गई है. इसमें कंधा और डंबा समुदायों के मुख्य देवता ‘तीजी राजा’ के पवित्र निवास स्थान का कोई जिक्र नहीं है, और न ही सिजीमाली पहाड़ियों पर हर साल दिसंबर में होने वाले रीति-रिवाजों और त्योहारों का कोई जिक्र है.

उनका तर्क है कि रिपोर्ट पहाड़ी की चोटी पर घने जंगलों का पर्याप्त रूप से दस्तावेजीकरण करने में विफल है और उन वन संसाधनों की अनदेखी करती है जो स्थानीय आजीविका की रीढ़ हैं.

गोपाल इस बात पर जोर देते हैं कि रिपोर्ट में गैर-लकड़ी वन उत्पादों (एनटीएफपी) पर बहुत कम या बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया गया है, जो स्थानीय परिवारों के लिए आय का एक बड़ा जरिया हैं. इनमें सियाली के पत्ते, महुआ के फूल, तेंदू के पत्ते, इमली, चार (चिरौंजी), शहद, बांस, जंगली आम और जंगल से मिलने वाली दूसरी चीजें शामिल हैं, जिन्हें ग्रामीण साल भर इकट्ठा करते हैं, इस्तेमाल करते है और बेचते भी हैं.

गोपाल बताते हैं कि ईआईए के 10 किलोमीटर के स्टडी एरिया में 21 रिजर्व्ड फॉरेस्ट (संरक्षित वन) हैं. उनके अनुसार, रिपोर्ट में सिजीमाली पहाड़ियों की कई पवित्र गुफाओं, खासकर पारापार और बाघपार का भी जिक्र नहीं है, जिन्हें स्थानीय समुदाय गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व वाली जगहें मानते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि इन गुफाओं में हर साल पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं और इन्हें वन्यजीवों, प्रकृति और पूर्वजों की मान्यताओं से जुड़ी पवित्र जगहों के तौर पर सम्मान दिया जाता है.

स्थानीय लोगों का यह तर्क है और  इस बात पर भी जोर देता है कि जब तक इन सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक पहलुओं को पर्यावरण मूल्यांकन में ठीक से शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक प्रस्तावित माइनिंग परियोजना के वास्तविक प्रभावों का सही आकलन संभव नहीं है. इसी वजह से उनकी यह मांग है कि सिजीमाली में प्रस्तावित बॉक्साइट माइनिंग परियोजना को रोका जाना चाहिए और कंपनी को इस इलाके से अपनी योजनाएं वापस ले लेनी चाहिए.

घर, परिवार और भविष्य की चिंता. (फोटो: दीपमाला पटेल)

‘अगर आज हम डर के आगे झुक गए, तो कल हमारे बच्चों के लिए कुछ नहीं बचेगा.’

राकेश (बदला हुआ नाम) अपने आंदोलन को अहिंसक बताते हैं. भारतीय संविधान, ग्रामसभा के अधिकारों और समुदाय द्वारा मिलकर फैसला लेने के सिद्धांत पर आधारित है. आज राकेश सिर्फ बन्तेजी गांव के आम निवासी नहीं , जंगल और जमीन के अधिकारों के लिए चल रहे संघर्ष का प्रतीक बन गए हैं.

उनकी कहानी यह दिखाती है कि विकास पर होने वाली चर्चाओं में जिन लोगों को अक्सर ‘पिछड़ा’ कहा जाता है, वही लोग सबसे ज्यादा कीमत चुकाते हैं. शांतिपूर्ण आंदोलन के बदले में, उन्हें बार-बार जेल जाना पड़ा और इन गिरफ्तारियों ने उनके परिवार को भारी आर्थिक तंगी में धकेल दिया. यह सिर्फ़ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है. यह उन सैकड़ों आदिवासी और जंगल पर निर्भर परिवारों के अनुभवों को दिखाती है जिनकी आजीविका जंगलों, खेती की जमीन और उनके पुश्तैनी इलाकों से गहराई से जुड़ी हुई है.

उनकी कहानी कई मुश्किल सवाल खड़े करती है: क्या जंगलों की रक्षा करना कोई अपराध है? क्या शांतिपूर्ण विरोध के लिए जेल की सजा मिलनी चाहिए? क्या लोगों की सहमति के बिना असली विकास हो सकता है?

धूप में फैला अनाज, मिट्टी से जुड़ी जिंदगी. (फोटो: दीपमाला पटेल)

लता देवी किसान हैं और गुजारे के लिए जंगल और अपने खेत दोनों पर निर्भर है. वह हर सुबह जंगल और खेत में अपना समय बिताती है. जंगल से महुआ, साग- सब्जी, चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी और पानी, तो खेत से चावल, दाल और सब्जियां मिलती है. यही उनकी दुनिया है, आजीविका है. अनाज का एक-एक दाना उनके बच्चों के भोजन और आने वाले भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा है. उनका भरोसा सिर्फ अनुभव, कड़ी मेहनत और प्रकृति पर है. जहा दुनिया आगे बढ़ रही है, लेकिन उनका भरोसा आज भी धरती पर अपनी मिट्टी पर टिका है. धूप में सूखता अनाज, यह सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि उसके परिवार की मेहनत, उम्मीद और भविष्य है.

वह कहती है, ‘जंगल रहेगा तो खेती रहेगी, और खेती रहेगी तो हमारा जीवन.’

लेकिन सिजीमाली में आज यह जीवन आसान नहीं बचा है. जंगल और जमीन पर बाहरी दबाव, योजनाओं और परियोजनाओं का डर, और भविष्य की अनिश्चितता सब कुछ उसके काम के साथ-साथ चलता है. फिर भी वह रोज की तरह खेत संभालती है, अनाज सुखाती है और उम्मीद बचाए रखती है. सिजीमाली की महिलाएं, जो किसान है, जो जंगल की रक्षक है, और जो अपने हक और धरती के लिए चुपचाप संघर्ष कर रही है. यह महिला सिर्फ अनाज नहीं सुखा रही, वह अपने अस्तित्व को बचा रही है.

सिजीमाली की मेरी यह यात्रा सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र को देखने की यात्रा नहीं थी, बल्कि एक ऐसे जीवन को समझने का प्रयास थी जो जंगल, जमीन और सामुदायिक रिश्तों पर टिका है. यहां ली गई तस्वीरें सिजीमाली के लोगों के रोजमर्रा के संघर्ष, श्रम, उम्मीद और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की कहानी कहती हैं.

यह कहानी केवल खनन और निवेश की कहानी नहीं है. यह उन पहाड़ों की कहानी है जो पानी देते हैं, उन जंगलों की कहानी है जो आजीविका देते हैं, और उन समुदायों की कहानी है जो अपनी जमीन, संस्कृति और भविष्य की रक्षा के लिए आवाज उठा रहे हैं. जलधाराओं से लेकर घरों की चौखट और दीवारों पर लिखे नारों तक, सिजीमाली का हर दृश्य एक सवाल उठाता है- विकास किसके लिए और किस कीमत पर?

Centre for Financial Accountability is now on Telegram and WhatsApp. Click here to join our Telegram channel and click here to join our WhatsApp channeland stay tuned to the latest updates and insights on the economy and finance.

Partner With Us Through Your Support

Strong democracies need financial accountability.

Behind every policy is a financial choice. CFA works to make those choices transparent and just.

Your support enables CFA to research, monitor, and speak up on how public resources are used. Together, we can ensure finance serves the public good.

Support the work—support accountability.