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हीरा खनन के पहले या हम कह सकते कि जब ऑस्ट्रेलिया की बहुराष्ट्रीय कंपनी रियो टिंटो द्वारा बक्सवाहा जंगल परिक्षेत्र में शोध कार्य किया गया तब स्थानीय लोग, जिसमें बहुसंख्यक शोर, कुर्रा व बड़ेला आदिवासी तथा यादव समाज है; की स्थिति क्या बदली और जंगल के प्रति उनकी सोच क्या है?
रियो टिंटो के बारे में –
सन् 2000 में बहुराष्ट्रीय कंपनी को 25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में रिकनेंस सर्वेक्षण की अनुमति मिली, जब रियो टिंटो इस जंगल में पहुंचा तो वहां बहुत अधिक संख्या में बंदर मिले, इसलिए इस परियोजना को बंदर डायमंड प्रोजेक्ट नाम दिया गया। जो कंपनी रिक्नेस सर्वेक्षण करती उसे प्रोस्पेक्टिंग लाइसेंस (पूर्वेक्षण अनुमति) में वरीयता प्रदान की जाती।  2011 में प्रोस्पेक्टिंग लाइसेंस की अवधि पूरी होने के बाद 2012 में रियो टिंटो ने 954 हेक्टेयर संरक्षित वन क्षेत्र में माइनिंग लीज के लिए आवेदन किया,  जिसमें कंपनी ने 3.43 करोड़ कैरेट हीरे का अनुमानित भंडार बताया। वन विभाग की जांच में सामने आया कि जिस क्षेत्र को कंपनी हीरा परियोजना के लिए मांग रही है वहां 20 सेंटीमीटर से अधिक व्यास के 500000 (पांच लाख पेड़) है, इसके बाद पर्यावरणविद व गैर सामाजिक संगठनों ने उच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की, जिससे कंपनी बैकफुट पर आ गई। उसके बाद 2014 में कंपनी ने 364 हेक्टेयर माइनिंग लीज के लिए आवेदन किया फिर भी कंपनी पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी नहीं हासिल कर सकी, जो अप्रत्याशित था।  2017 में कंपनी ने इस परियोजना से हाथ खींच लिए, उसने अपना प्रोसेसिंग प्लांट व पूरी संपत्ति राज्य सरकार को सुपुर्दगी में देकर विदा ले ली। बताया जाता है कि कंपनी ने 2020 कैरेट हीरे भी खनिज विभाग को सौंपे।
इसके बाद हीरा खदान को 10 दिसंबर 2019 की नीलामी में बिड़ला समूह कि  एस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्री लिमिटेड कंपनी ने 56000 करोड़ के ऑफसेट मूल्य में 382.131 हेक्टेयर जमीन 50 साल की माइनिंग लीज पर खरीदी, जिसमें 62.64 हैक्टेयर क्षेत्र हीरा खनन हेतु चिन्हित किया गया, शेष भूखंड का उपयोग हीरा निष्कर्षण से निकले मलवा को डंप करने, प्रोसेसिंग व कंपनी के ऑफिस आदि कार्यों के लिए किया जाएगा। जिसके लिए 2.15 लाख पेड़ कते जाएंगे। इस परियोजना से सरकार को रियो टिंटो की तुलना में  4 गुना अधिक राजस्व मिलेगा, 50 साल की अवधि में सरकार को 1550 करोड़ रुपए प्रति वर्ष मिलने की उम्मीद है।
चूंकि 40 हेक्टेयर से अधिक खनन प्रोजेक्ट के लिए केंद्र सरकार से अनुमति लेना होती, जो अभी तक मिली नहीं लेकिन जैसे ही इतने  बड़े जंगल को साफ करने की बात मीडिया में आई तो को रोना के इस दौर में लोगों को पर्यावरण का महत्व समझ में आने लगा, शीघ्र ही यह मुद्दा राष्ट्रीय बन गया जिससे पर्यावरणविदों व गैर सरकारी संगठनों ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। मामला राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण भोपाल में ले जाया गया, फिलहाल जंगल की सफाई पर स्टे लगा हुआ है जिस पर राज्य सरकार को अपना पक्ष रखना है। हीरा खनन से लोगों में रोजगार की आशा जरूर जागी है लेकिन रियो टिंटो कंपनी पर उनका भरोसा आज भी कायम है जब उनसे पूछा गया कि रियो टिंटो कंपनी के इस परियोजना से पीछे हटने का क्या कारण है तो विजयपाल निषाद कहते हैं कि रियो टिंटो कंपनी जनता के साथ थी; प्रशासन के साथ नहीं और बिड़ला समूह प्रशासन के साथ है; जनता के साथ नहीं। फिर भी बक्सवाहा जंगल में आज जब हीरा खनन कार एस्सेल माइनिंग इंडस्ट्री लिमिटेड ने शुरु नहीं किया तब स्थानीय विकास व लोगों की स्थिति जानना जरूरी है।
यह क्षेत्र छतरपुर जिला मुख्यालय से 100 किलोमीटर दूर घने जंगलों और पहाड़ों के बीच में है पर्यावरण मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल की वन सलाहकार समिति ने  नवंबर 2015 को अपनी रिपोर्ट में  कहां की यह जंगल ‘इन्वाइलेट श्रेणी’ का है  वन की इस श्रेणी को 2014 में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण  वन क्षेत्रों के विनाश को रोकने के लिए बनाया गया था – ऐसे वन जिनमें  उच्च जैव विविधता, उच्च जल विज्ञान मूल, अनुसूचित वन्य जीव प्रजातियों की प्रजनन आबादी और घने वृक्षों के आवरण है, को खनन के लिए नहीं काटा जा सकता। वन सलाहकार समिति में अपनी रिपोर्ट में  इस क्षेत्र के वन्यजीवों चौसिंगा, तेंदुआ, चीतल, चिंकारा, मोर, जंगली सूअर आदि की कुछ दुर्लभ व लुप्त प्राय प्रजातियो का उल्लेख भी किया।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की 2016 की रिपोर्ट जिसे एक आरटीआई आवेदन से प्राप्त किया गया, जिससे पता चला कि बक्सवाहा जंगल पन्ना टाइगर रिजर्व से नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण तक 250 किलोमीटर क्षेत्र में एक जंगल गलियारा के रूप में कार्य करता है, इस जंगल गलियारा से  2009 में T3 नामक नर बाघ ने  यात्रा की थी, रिपोर्ट में यह भी कहा गया “ऐसा प्रतीत होता है कि 2009 के बाद कम से कम 3 बाघों ने इस जंगल गलियारा का उपयोग किया”।
इस प्रकार यह एक बहुत ही घना जंगल है एक समय था जब यहां  डाकू निवास करते थे, राजनीति डाकू चलाते थे, प्रशासन की सांठगांठ थी। 1972 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ  डाकूयों ने मौली डाक बंगला नामक स्थान पर बातचीत की और वे मुख्य धारा में लौटने को तैयार हुए । उसके बाद क्षेत्र के लोगों ने स्वतंत्र विचरण करना शुरू किया। आदिवासी जंगलों में रहकर अपना पालन पोषण करते, उनका मुख्य व्यवसाय लघु वनोपज पर ही निर्भर रहा और आज भी वह इसी पर निर्भर है बक्सवाहा हीरा खनन परियोजना में 5 गांव सगोरिया, शाहपुरा, जरा, हरदुआ व  हिर्देपुर सीधे प्रभावित हैं शाहपुरा के आदिवासी जीवन लाल कहते है कि हमारी पीढ़ियां इसी जंगल पर निर्भर रहते हुए गुजर गई, सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया। वे कहते आज तक कलेक्टर यहां पर नहीं आए।  जीवनलाल बताते हैं आज आप हमारे बीच में जो स्कूल, पीने के पानी के लिए बोर व सड़कें देख रहे, यह सब रियो टिंटो की देन है बाकी हमारा जंगल हमें रोजी रोटी मुहैया कराता है। जंगल में सभी प्रकार के वृक्ष  है – जैसे सागौन, साल, नीम, महुआ, बेल, तेंदूपत्ता, आंवला, अचरवा(चिरोंजी), केम, जामुन, साज आदि। यही हमारा सबकुछ है।  मौसम के अनुसार हमें इन वृक्षों से आमदनी होती है, 15 दिन में हम अकेले 25 से 30,000 रुपए के महुआ इकट्ठा कर लेते, लगभग इतने ही रुपए की तेंदूपत्ता और इतना ही आंवला अचरवा से अपनी आमदनी करते हैं। एक आदिवासी बताते हैं कि तेंदूपत्ता इकट्ठा करने वाला प्रत्येक व्यक्ति 15 से 20000 रुपए की आय की उम्मीद कर सकता है तथा परिवार में जितने अधिक सदस्य होंगे, उतनी अधिक आय प्राप्त की जा सकती है। जंगल से हमें सभी प्रकार की औषधि जैसे – बाल बिरंगे, निबोली, सतावर, गुरखुरू,  मूसली, घुंचू तथा अनगिनत पत्तियां जिनके नाम भी पता नहीं मिल जाती, कभी हम डॉक्टर के पास नहीं जाते, रियो टिंटो ने जरूर कैंप में एक डॉक्टर रखा था, जो हमारा इलाज करता था।
इस प्रकार लघु वनोपज से वनवासी समुदायों की घरेलू आय में काफी वृद्धि होती है 2011 में योजना आयोग के वर्किंग ग्रुप पेपर में अनुमान लगाया गया कि वनवासी परिवार की लघु वनोपज से आय, कुल आय का 30 से 60% के बीच है। (इसमें लकड़ी शामिल नहीं है) लघु वनोपज के संग्रहण और बिक्री से ना केवल नकदी मिलती बल्कि किसान को बुवाई के समय आवश्यक लागत भी उपलब्ध हो जाती हंसार्ड में खरीफ की फसल की पहली वह महुआ और तेंदूपत्ता से आमदनी कर लेता यह नकली बुंदेलखंड में किसान के लिए बहुत मायने रखती जंगली क्षेत्र के अलावा शेष बुंदेलखंड के पठारी भाग में किसान को लागत के लिए किसान क्रेडिट कार्ड या साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ता जो समय पर नहीं मिल पाता ऐसे में दुगना ब्याज देना पड़ता कुल मिलाकर कृषि लागत एक महंगा व्यवसाय है खास तौर पर खरीफ सीजन में जिसे मानसून का जुआ कहते हैं।
रवि सीजन के पूर्व तेंदूपत्ता इकट्ठा करके बीड़ी बनाकर लगभग 30,000 की आमदनी करते जिसे आवश्यक लागत उपलब्ध हो जाती कुछ आदिवासी हस्तशिल्प का काम बहुत बारीकी से करते जैसे लैंड पीना बंद तुलसा से फर्नीचर बनाना लकड़ी के खिलौने बनाकर भेजना जड़ी बूटी बेचना शहद निकाल कर भेजना आदि कुल मिलाकर स्वावलंबी जीवन है और ग्रामीण सभ्यता के रूप में एक प्रकृति संरक्षण के संरक्षक भी हैं वीरेंद्र निषाद कहते हैं रियो टिंटो के आने के बाद हमें एक सबसे बड़ी सुविधा जल स्रोतों की हुई हमारे क्षेत्र में कंपनी ने जंगल की आस पास प्रत्येक गांव में लगभग दो तालाब खुदाई तथा पीने के पानी के लिए बोर्ड कराएं पानी की टंकी रखो भाई स्कूलों में पानी की टंकी रखी जिससे बच्चों की शिक्षा व्यवस्था में मजबूती आई साथ ही फसल सिंचाई होने लगी, किसान जो कमजोर है कंपनी ने उन्हें बीज उपलब्ध कराने में भी मदद की। रियो टिंटो ने भारत सरकार को प्रस्तुत अपने दस्तावेज में कहा कि हमने 1500 अस्थाई व 700 स्थाई नौकरी पैदा की । कसेरा निवासी विवेक आदिवासी कहते हैं कि एक गांव से औसतन 10 लोग और बक्सवाहा सहित कुल 300 स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सका, लेकिन लोगों  को इसके अलावा अलग अलग तरीके से लाभ हुए, कंपनी छोड़ कर गई तब वह काम करने वालों को 3 से 5 लाख रुपए बोनस के रूप में भी दे कर गई।
कंपनी के लोग प्रत्येक 7 दिन बाद हमारे बीच आते थे और हमारी समस्याओं को सुनकर उनका निराकरण करते थे। कुछ ग्रामीण कंपनी से सहानुभूति रखते हुए कहते जरूर कंपनी हीरा खनन  नहीं कर पाई, लेकिन हमारे विकास के लिए परमात्मा बन कर आई, हमारे क्षेत्र को मुख्यधारा से जोड़ने में रियो टिंटो का महत्वपूर्ण योगदान है।

Picture courtesy: Ankit Mishra

This is a four-part series done for the Smitu Kothari Fellowship and published in the Newspaper Subah Savere. You can find all the other parts of the story here.

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