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नर्मदा नदी पर बने पहले बरगी बांध से मध्यप्रदेश के मंडला, सिवनी और जबलपुर जिले का आदिवासी बाहुल्य 162 गांव विस्थापित एवं प्रभावित हुआ हैं।इसी विस्थापित गांव चुटका जिला मंडला में परमाणु परियोजना प्रस्तावित किया गया है। चुटका परमाणु परियोजना की सैद्धांतिक मंजूरी 2009 में मिला।नेशनल इन्वायरमेंटल इंजिनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट (नीरी)संस्थान नागपुर ने इस परियोजना का मार्च 2013 में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट दिया।इस रिपोर्ट के आधार पर जनसुनवाई दिनांक 24 मई और 31 जुलाई 2013 को निर्धारित किया गया था। परन्तु क्षेत्रीय समुदायों के तीखा विरोध के कारण जिला प्रशासन को इसे रद्द करना पड़ा था। 17 फरवरी 2014 को भारी पुलिस बल लगा कर जनसुनवाई की औपचारिकता पूरा किया गया।ग्रामीणों ने सर्वे करने वालों को गांव में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया।क्योंकि यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूची में वर्गीकृत है जहां पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996 यानि पेसा कानून प्रचलित है।इसके तहत प्रभावित सभी ग्रामों ने इस परियोजना के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया। जिला प्रशासन ने 29 जून 2012 को भू अर्जन की प्रक्रिया शुरू कर प्रत्येक प्रभावित गांव में धारा- 4 की नोटीस जारी कर दिया। इसका भी ग्रामीणों कलेक्टर मंडला को लिखित में विरोध दर्ज किया गया।सभी विरोधों को दरकिनार करते हुए जबलपुर कमिश्नर द्वारा 11 दिसम्बर 2015 को परियोजना के पक्ष में अवार्ड पारित कर दिया। जमीन का मुआवजा लगभग 3.75 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर निर्धारित किया गया। 22 सितम्बर 2015 को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित केबिनेट बैठक में 41.49 हेक्टेयर गांव की निस्तारी भूमि परियोजना को दे दिया गया।चुटका परियोजना के लिए 54.46 हेक्टेयर आरक्षित वन और 65 हेक्टेयर राजस्व वन को परिवर्तित करने की मंजूरी दिनांक 25 अगस्त 2017 को दे दिया गया।जबकि वन अधिकार कानून 2006 के अन्तर्गत लगे व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों का निराकरण ही नहीं हुआ है। परियोजना से प्रभावित गांव चुटका के वन भूमि पर काबिज 48 काश्तकारों को वन अधिकार पट्टा और राजस्व की घास जमीन पर 35 लोग कब्जा कर वर्षों से खेती कर रहे हैं। परियोजना प्रभावित गांव कुंडा के वन भूमि पर काबिज 35 काश्तकारों को वन अधिकार पत्र नहीं दिया गया है। जबकि वर्तमान में लोग अभी काबिज जमीन पर खेती कर परिवार का जीवन यापन चला रहे हैं।दूसरी ओर बरगी जलाशय में कार्यरत 45 मछुआरा सहकारी समिति में से 5 मछुआरा समितियों के 187 मछुआरा सदस्य परियोजना के सुरक्षा कारणों से जलाशय में मत्स्याखेट करने से वंचित हो जाएगा। आसपास के ग्रामीण परियोजना से निकलने वाले रेडियोधर्मी विकिरण को लेकर परियोजना का विरोध कर रहे हैं। राजीव गांधी पंचायती राज संगठन और चुटका परमाणु विरोधी संघर्ष समिति के संयुक्त तत्वावधान में चुटका परमाणु परियोजना के विरोध में जबलपुर शहर के विभिन्न क्षेत्रों में जन संपर्क और नुक्कड़ सभा किया जा रहा है। परियोजना विस्थापितों के पुनर्वास के लिए बनाए गए कालोनी में लोग शिफ्ट नहीं हो रहे हैं और गांव खाली नहीं कर रहे हैं। अभी तक परियोजना कार्य जनदबाव के कारण शुरू नहीं हुआ है। दूसरी ओर मध्यप्रदेश में चुटका परमाणु परियोजना के अतिरिक्त 2024 में न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआईएल) ने प्रदेश में नीमच के वासी, देवास के बाबङीखेङा, सिवनी के किंदरई और शिवपुरी जिले के नरवर तहसील के भीमपुर गांव में 2800 मेगावाट की परमाणु परियोजना को केंद्र सरकार की परमाणु ऊर्जा विभाग ने सैद्धांतिक स्वीकृति दे दिया है। भीमपुर परमाणु परियोजना पूर्व से प्रस्तावित है,जिसे चुटका परियोजना के साथ ही मंजूरी मिलना था जो अब हुआ है।


भारत में चरणबद्ध तरीके से परमाणु ऊर्जा में 49 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने का निर्णय लिया है।सरकार शुरुआती चरण में केवल 26 प्रतिशत तक की अनुमति दे सकती है और समीक्षा के बाद इसे बाद में बढ़ा सकती है। केन्द्र सरकार ने 2035 तक अपनी परमाणु ऊर्जा को वर्तमान 8 गीगावाट से बढ़ाकर 40 गीगावाट करने के लिए निजी क्षेत्र के लिए रणनीतिक क्षेत्र खोलने की योजना बनाई है।


भारत में पिछले 50 वर्षों का अनुभव बताता है कि किसी परमाणु संयंत्र को निर्माण शुरू होने से ग्रिड से जुड़ने तक 12 से 14 वर्ष लगते हैं। यदि इसे बहुत उदारता से 10 वर्ष भी मान लें, तो भी 2035 तक अधिकतम 16 गीगावाट की क्षमता संभव है।वास्तव में आज परमाणु ऊर्जा भारत की कुल बिजली का लगभग 3 प्रतिशत देती है, लेकिन देश की कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति में इसका योगदान 1 प्रतिशत से थोड़ा अधिक है। यदि परमाणु ऊर्जा को पूरी तरह बंद कर भी दिया जाए और उसे नवीकरणीय स्रोतों से बदला जाए, तो देश की ऊर्जा सुरक्षा पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा। इसके विपरीत, नवीकरणीय ऊर्जा आज कहीं अधिक तेज़ी से, कम लागत पर और कम जोखिम के साथ बढ़ रही है। परमाणु ऊर्जा इस समय सबसे महंगी और सबसे धीमी तकनीक बन चुकी है।
भारत सरकार परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट, 2010 में संशोधन कर दिया है ताकि निजी कंपनियों को भारत में परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और विकास में भाग लेने और परमाणु उद्योग के लिए विदेशी निवेश आकर्षित करने की सुविधा मिल सके।
एक लघु मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर’ (एसएमआर) , अपने 60 वर्षों के अपेक्षित जीवन में, अपशिष्ट के रूप में लगभग 1,800 टन व्यय ईंधन उत्पन्न करेगा। चुने गए स्थल को बहुत लंबी अवधि में व्यय ईंधन के सुरक्षित और सुरक्षित भंडारण के लिए प्रावधान करना होगा। कानूनी प्रावधानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि निजी पक्षों के स्वामित्व वाली साइटें विनियामक नियंत्रण में रहें। डिज़ाइन और लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं में प्रारंभिक रूप से खर्च किए गए ईंधन और रेडियोधर्मी अपशिष्ट प्रबंधन आवश्यकताओं को शामिल करने से यह सुनिश्चित होगा कि सभी अपशिष्टों के निपटान के लिए एक स्थापित मार्ग है।एसएमआर के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए, उत्पादन और मॉड्यूल असेंबली के सभी चरणों में, तथा तत्पश्चात स्टार्ट-अप और संचालन के लिए, उत्पादन और सुरक्षा मानकों के अनुपालन के लिए, विनियामक निरीक्षण और नियंत्रण की अत्यधिक आवश्यकता होगी।


परमाणु कानून में बदलाव का संकेत 2022 में भारत-अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों के बीच वाशिंगटन की द्विपक्षीय वार्ता के समय ही मिल गया था, जब अमेरिकी कम्पनी ने भारत में 60 हजार करोड़ रुपए की लागत से छह परमाणु रिएक्टर लगाने और भारत के घरेलू उपयोग और निर्यात के लिए ‘लघु मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर’(एसएमआर) तकनीक के विकास पर करीब 10 हजार करोड़ रुपए निवेश की इच्छा जाहिर की थी। ‘एसएमआर’ ऐसे परमाणु रिएक्टर होते हैं जो केवल 10 से 300 मेगावाट बिजली उत्पादित करते हैं। इनके मॉड्यूलर डिजाइन और छोटे आकार के चलते जरूरत के मुताबिक एक ही साइट पर इनकी कई इकाइयां लगाई जा सकती हैं। इसको लेकर उस समय ‘न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया’ और ‘वाशिंगटन इलेक्ट्रिक कंपनी’ के बीच 2022 में बातचीत हुई थी।सवाल उठता है कि परमाणु क्षेत्र में निवेश करने वाली कम्पनियां भारत क्यों आना चाहती हैं? दरअसल आजकल परमाणु बिजली उद्योग में जबरदस्त मंदी है, इसलिए अमेरिका, फ्रांस और रूस आदि देशों की कम्पनियां भारत में इसके ठेके और आर्डर पाने के लिए बेचैन हैं।


प्रदेश की जनता परमाणु संयंत्र से बनने वाली बिजली का दर जानना चाहती है।जो नहीं बताया जा रहा है,जबकि उत्पादित बिजली का 50 प्रतिशत मध्यप्रदेश सरकार को खरीदना है। मध्यप्रदेश विधुत कम्पनियां चुटका परमाणु संयंत्र से महंगी बिजली खरीदी अनुबंध करती है तो प्रदेश की 1.30 करोङ बिजली उपभोक्ताओं को ही आर्थिक बोझ उठाना होगा।जबकि उपभोक्ता महंगी बिजली के कारण पहले से परेशान है। म.प्र विधुत कंपनी 49239 करोड़ रुपए के कर्ज और 71394 करोड़ रुपए के संचयी घाटे में है।यह आंकङा 31 मार्च 25 तक के हैं।

राज कुमार सिन्हा । बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

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