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पश्चिम एशिया लंबे समय से वैश्विक ऊर्जा राजनीति का केंद्र रहा है। विश्व के कुल कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस भंडार का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र में स्थित है। इसलिए इस क्षेत्र में होने वाला कोई भी सैन्य या राजनीतिक संकट सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित करता है।ईरान विश्व के सबसे बड़े तेल और गैस भंडार वाले देशों में से एक है।विश्व के कुल तेल भंडार का लगभग 9 प्रतिशत ईरान के पास है।

प्राकृतिक गैस के मामले में यह विश्व में दूसरे स्थान पर है।2019 से पहले तक ईरान भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्तिकर्ताओं में से एक था, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत को ईरान से तेल आयात बंद करना पड़ा है। ईरान के साथ अमेरिका- इजरायल का युद्ध पूरी ने पूरी दुनिया में ऊर्जा की आपूर्ति और कारोबार को प्रभावित किया हुआ है। होर्मुज स्ट्रेट के समुद्री रास्तों से होने वाली ऊर्जा आपूर्ति बंद होने से दुनिया में महंगाई बढ़ने का खतरा इस बार अभूतपूर्व है।ईरान की जंग ने दुनिया के सबसे अहम कारोबारी मार्ग को लाचार बना दिया है। होर्मुज स्ट्रेट से दुनियाभर में टैंकरों के जरिए तेल की ढुलाई का एक प्रमुख समुद्री मार्ग है। इसके जरिए खाड़ी के देशों से यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका तक तेल की ढुलाई होती है।कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है, और ईरान ने 200 डालर प्रति बैरल तक की चेतावनी दी है, जो वैश्विक मुद्रास्फीति (महंगाई) को बढ़ा सकता है।भारत, चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, थाईलैंड और वियतनाम जैसे एशियाई देशों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है, क्योंकि ये अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मिडिल ईस्ट पर बहुत अधिक निर्भर हैं।आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था काफी हद तक कच्चे तेल की लगातार और निर्बाध सप्लाई पर टिकी हुई है। जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध या बड़ा तनाव पैदा होता है, तो सप्लाई चेन पर उसका सीधा असर पड़ता है। तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है और महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है।

आधुनिक युग में ऊर्जा केवल जीवन जीने का साधन नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास, आर्थिक वृद्धि, तकनीकी प्रगति और जीवन स्तर में सुधार का सबसे महत्वपूर्ण कारक बन गई है। ऊर्जा खपत और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सीधा संबंध है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है और अपनी तेल आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत तथा गैस की बड़ी मात्रा आयात करता है। इसलिए ईरान से जुड़ा कोई भी युद्ध या तनाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति को प्रभावित करता है। भारत का तेल आयात बिल पहले से ही बहुत बड़ा है। तेल कीमतों में वृद्धि से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार और राजकोषीय संतुलन प्रभावित होगा। भारत की ऊर्जा खपत तेजी से बढ़ रही है। औद्योगीकरण, शहरीकरण और बढ़ती आबादी के कारण ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है।कच्चा तेल, परिवहन व्यवस्था और उद्योग के लिए मुख्य ऊर्जा स्रोत है।प्राकृतिक गैस, बिजली उत्पादन और उर्वरक उद्योग के लिए उपयोगी है। इसलिए भारत को पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता के लिए सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभानी चाहिए। ईरान युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक

ऊर्जा बाजार कितना संवेदनशील और अस्थिर है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी है।
ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार, सामरिक भंडार और सक्रिय ऊर्जा कूटनीति ही भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकता है। भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की अनिवार्य शर्त है। स्थायी और विकेंद्रीकृत ऊर्जा व्यवस्था ग्रामीण विकास, रोजगार सृजन और सामाजिक समानता को भी बढ़ावा देती है। ऊर्जा आत्मनिर्भरता केवल उत्पादन बढ़ाने से नहीं बल्कि ऊर्जा के कुशल उपयोग से भी प्राप्त की जा सकती है। भारत में अभी भी कई संभावित तेल और गैस भंडार पूरी तरह से खोजे नहीं गए हैं। अपतटीय क्षेत्रों, शेल गैस और कोल बेड मीथेन जैसे संसाधनों के विकास से घरेलू उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। यदि सरकार, उद्योग और समाज मिलकर दीर्घकालिक दृष्टि से इन उपायों को लागू करें, तो भारत आने वाले दशकों में न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है बल्कि वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन में अग्रणी भूमिका भी निभा सकता है। भविष्य में यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तो भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति को और अधिक लचीला और बहुआयामी बनाने और दीर्घकालिक योजना पर काम करने पर जोर देना होगा।

राज कुमार सिन्हा। बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

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