आज दुनिया भर में जलवायु संकट बढ़ रहा है और इसी वजह से जस्ट एनर्जी ट्रांजिशन (JET) की चर्चा तेज हो गई है। इसका सीधा मतलब है कि हमें धीरे-धीरे जीवाश्म ईंधनों (जैसे कोयला और तेल) से हटकर स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना होगा। भारत इस बदलाव में एक कठिन उदाहरण है, क्योंकि यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है और अपनी ऊर्जा मांग का लगभग 80% हिस्सा अब भी कोयला, तेल और बायोमास से पूरी करता है। झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कोयला केवल ऊर्जा का साधन ही नहीं, बल्कि वहाँ की राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुका है।
साल 2021 में ग्लासगो में हुए COP26 सम्मेलन में भारत ने वादा किया कि वह 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन हासिल करेगा। इसके लिए 2030 तक गैर-जीवाश्म ऊर्जा की क्षमता 500 गीगावाट तक बढ़ाने और 2005 के स्तर से 45% तक कार्बन उत्सर्जन घटाने का लक्ष्य रखा गया। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत यह है कि कोयला अब भी भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास का अहम आधार है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने एक अरब टन से भी ज्यादा कोयला निकाला। आज हमारी कुल बिजली का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा कोयले से ही बनता है। जिसमें कोयले का राष्ट्रीय ऊर्जा मिश्रण में 55% और कुल बिजली उत्पादन में 74% से अधिक का योगदान था। सरकार ने साफ कहा है कि बढ़ती मांग को देखते हुए 2030 से पहले कोयला आधारित बिजली घरों को बंद नहीं किया जाएगा। यानी ऊर्जा जरूरतों और जलवायु लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है।
भारत में कोयले पर निर्भरता घटाने का एक तरीका है,पुराने और कमज़ोर कोयला संयंत्रों को धीरे-धीरे बंद करना शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2030 तक लगभग 54 गीगावाट क्षमता बंद की जा सकती है। फिर भी सरकार का वर्तमान रुख सतर्क है, क्योंकि अचानक बदलाव करने से ऊर्जा की कमी और आर्थिक अस्थिरता का खतरा है। इसके अलावा भारत में कोयले पर निर्भरता घटाने का एक तरीका है,पुराने और कमज़ोर कोयला संयंत्रों को धीरे-धीरे बंद करना शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2030 तक लगभग 54 गीगावाट क्षमता बंद की जा सकती है। फिर भी सरकार का वर्तमान रुख सतर्क है, क्योंकि अचानक बदलाव करने से ऊर्जा की कमी और आर्थिक अस्थिरता का खतरा है। इसके अलावा कोयला उद्योग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार देता है। कई इलाकों में तो आबादी का चौथाई हिस्सा कोयला कामों पर निर्भर है। ऐसे में अचानक बदलाव उन इलाकों की अर्थव्यवस्था और समाज दोनों को हिला सकता है।
Read and Download the report here: चंद्रपुरा की आवाज़: झारखंड में न्यायपूर्ण ऊर्जा संक्रमण का सामूहिक निर्माण
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