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इंदौर को वर्षों से स्वच्छ शहर के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है, लेकिन जनवरी 2026 की शुरुआत में सामने आई घटनाएं इस दावे की भयावह सच्चाई उजागर करती है। दूषित पेयजल पीने से इंदौर में अब तक 15 लोगों की मृत्यु की खबरें सामने आ चुकी हैं। यह केवल एक आकस्मिक त्रासदी नहीं है, बल्कि वर्षों से ज्ञात कमियों, प्रशासनिक लापरवाही और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा किए गए गंभीर खुलासों तथा अनुशंसाओं की लगातार अनदेखी का नतीजा है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट संख्या 3/2019 में इंदौर और भोपाल की जलप्रदाय व्यवस्था को लेकर जो तथ्य सामने आए थे, वे किसी भी जिम्मेदार सरकार और नगर प्रशासन के लिए चेतावनी होने चाहिए थे। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2013 से 2018 के बीच इन दोनों शहरों में 5.45 लाख से अधिक जल-जनित बीमारियों के मामले दर्ज हुए थे। इसका प्रमुख कारण यह था कि भोपाल के 3.62 लाख और इंदौर के 5.33 लाख, यानी कुल लगभग 8.95 लाख परिवारों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं कराया जा रहा था। इसी अवधि में लिए गए 4,481 पानी के नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए थे। रिपोर्ट ने यह भी उजागर किया कि जलप्रदाय व्यवस्था की बुनियादी खामियों को सुधारने में नगर निगमों की गति बेहद धीमी थी। पाइपलाइन लीकेज की शिकायतों के समाधान में 22 से 108 दिन तक का समय लगाया जाता रहा। ऐसे हालात में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब दूषित पानी लोगों के घरों तक पहुंच रहा हो, तो उनकी जान कैसे सुरक्षित रह सकती है? स्थिति को और गंभीर बनाता है यह तथ्य है कि ओवरहेड टंकियों की नियमित सफाई के लिए कोई प्रभावी तंत्र ही मौजूद नहीं था। इंदौर और भोपाल दोनों नगर निगमों में वॉटर ऑडिट तक नहीं किया गया, जिससे जलप्रदाय प्रणाली की वास्तविक स्थिति और नुकसान का आकलन ही नहीं हो सका। सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, कुल कच्चे पानी की आपूर्ति की तुलना में 65 से 70 प्रतिशत तक पानी वितरण से पहले ही नष्ट हो जाता था। यह इंदौर नगर निगम में पानी की आपूर्ति के अत्यंत खराब प्रबंधन को दर्शाता है। इतना ही नहीं, सीएजी की 31 मार्च 2021 को समाप्त वर्ष की रिपोर्ट (रिपोर्ट क्रमांक 2) में स्पष्ट निर्देश थे कि ट्रायल रन अवधि शुरू होने के बाद प्रत्येक जल स्रोत से कम से कम 15 दिनों में एक बार पानी का नमूना जिला या ब्लॉक स्तरीय प्रयोगशालाओं में परीक्षण के लिए भेजा जाए। ऑडिट में यह पाया गया कि तय समय पर जल गुणवत्ता परीक्षण किए ही नहीं जा रहे थे। यह लापरवाही सीधे तौर पर जन-स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया के अमूल्य निधि ने कहा है कि सीएजी जैसे संवैधानिक और महत्वपूर्ण संस्थान द्वारा जन स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर किए गए गहन ऑडिट और जीवनरक्षक अनुशंसाओं की अनदेखी एक गंभीर अपराध के समान है। इसकी कीमत समाज ने 15 लोगों की जान देकर चुकाई है और यदि अब भी सबक नहीं लिया गया, तो ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी। जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया मध्यप्रदेश ने इंदौर में दूषित पेयजल आपूर्ति के मुद्दे पर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी. आर. पाटील, मध्यप्रदेश के लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के मंत्री तथा प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है। इस पत्र में न केवल इंदौर, बल्कि पूरे प्रदेश और देश में पेयजल व्यवस्था में बुनियादी सुधार की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। अभियान ने मांग की है कि प्रदेश के सभी शहरों में वार्ड-स्तर पर स्वतंत्र और प्रामाणिक प्रयोगशालाओं से वार्षिक जल गुणवत्ता परीक्षण अनिवार्य किया जाए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नियमित अंतराल पर जल गुणवत्ता की निगरानी करनी चाहिए। जल परीक्षण के नमूने केवल स्रोतों से ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक नलों और चयनित घरों से भी लिए जाएं। स्वास्थ्य विभाग को पिछले एक वर्ष में जल-जनित रोगों की विस्तृत रिपोर्ट शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग-अलग जारी करनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में लागू नल जल योजना के तहत पंचायत स्तर पर हर वर्ष जल परीक्षण अनिवार्य किया जाए। आर्सेनिक और फ्लोराइड से प्रभावित 440 बसाहटो के लगभग 2.39 लाख लोगों के लिए सुरक्षित पेयजल की स्थायी व्यवस्था की जाए। इसके साथ ही पूरे प्रदेश में जलप्रदाय पाइपलाइन और सीवेज लाइनों को अलग करना, भारतीय सार्वजनिक जल मानक बनाना और लागू करना, वार्ड-स्तर पर जल गुणवत्ता निगरानी एवं सार्वजनिक सूचना प्रणाली विकसित करना तथा मध्यप्रदेश जल नीति जारी करना अत्यंत आवश्यक है।

यह भी ज़रूरी है कि प्रदेश के सभी शहरों और कस्बों में पानी, हवा और स्वास्थ्य का समग्र ऑडिट किया जाए। स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल, शुद्ध हवा और प्रदूषण-मुक्त पर्यावरण कोई उपकार नहीं, बल्कि नागरिकों का मौलिक अधिकार है। इंदौर की यह त्रासदी एक चेतावनी है।यदि अब भी व्यवस्थागत सुधार नहीं किए गए, तो इसकी कीमत समाज को बार-बार अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी।

घटना के बाद सरकार हरकत में आई

राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में स्थिति रिपोर्ट दाखिल की, जिसमें उन्होंने मौतों का औपचारिक आंकड़ा पेश किया और यह दावा किया कि दूषित पानी से स्वास्थ्य संकट पर नियंत्रण पाने के लिये कदम उठाए जा रहे हैं। प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता की जांच के लिए 70 से अधिक पानी के नमूने मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और खाद्य विभाग द्वारा लिए गए हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पानी कब तक सुरक्षित है और दूषित स्रोत कहां-कहां हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने इंदौर नगर निगम के आयुक्त को हटा दिया है और कई वरिष्ठ नगर निगम तथा लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के अधिकारियों को निलंबित या स्थानांतरित किया है। यह कार्रवाई मुख्यतः प्रशासनिक लापरवाही को आधिकारिक तौर पर गंभीर मानते हुए की गई है।

संवैधानिक प्रावधान

भारत में भले ही स्वच्छ पानी को अलग से मौलिक अधिकार के रूप में न लिखा गया है, लेकिन अनुच्छेद 21, पर्यावरण कानूनों और न्यायिक निर्णयों के माध्यम से यह स्पष्ट रूप से एक कानूनी एवं मानवाधिकार के रूप में स्थापित है।अनुच्छेद 21 के “जीवन के अधिकार” की व्याख्या में स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल का अधिकार शामिल है।जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 जल स्रोतों के प्रदूषण को रोकना, केंद्रीय प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड को निगरानी और कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है तथा पानी के स्रोतों की गुणवत्ता सुरक्षा का प्रावधान शामिल है। संविधान की 11वीं अनुसूची में पंचायत को ग्रामीण पेयजल और 12 वीं अनुसूची में नगरपालिका को शहरी जल आपूर्ति सुनिश्चित करने का प्रावधान किया गया है।संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2010 में सुरक्षित पीने का पानी और स्वच्छता को मानवाधिकार में शामिल किया है। यदि स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है या स्रोत प्रदूषित है, तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 226/32 के अन्तर्गत याचिका दायर करने, राष्ट्रीय हरित अधिकरण एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और लोकायुक्त एवं मानवाधिकार आयोग में शिकायत कर सकते हैं।

निष्कर्ष

यह त्रासदी बताती है कि स्वच्छता के दिखावटी सूचकांक और पुरस्कार तब तक अर्थहीन हैं, जब तक बुनियादी सेवाएं, विशेषकर स्वच्छ पेयजल सुरक्षित और भरोसेमंद न हों। घटना के बाद की गई प्रशासनिक कार्रवाइयां और निलंबन आवश्यक तो हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं। जब तक पारदर्शी, नियमित और स्वतंत्र जल गुणवत्ता परीक्षण, सार्वजनिक रिपोर्टिंग, जवाबदेही तय करने की स्पष्ट व्यवस्था और दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार लागू नहीं किए जाते, तब तक ऐसे संकट दोहराते रहेंगे।


राज कुमार सिन्हा। बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

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