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भारत में 60 करोड़ से अधिक लोग भूमि, जल, जंगल और समुद्र जैसे प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर हैं । देश में 14.6 करोड़ छोटे और सीमांत किसान, 14.4 करोड़ खेतिहर मजदूर ( बड़ी संख्या में दलित हैं), 27.5 करोड़ वन निवासी, 2.8 करोड़ मछुआरे, 1.3 करोड़ पशुपालक और 1.7 करोड़ कारीगर हैं जो सीधे तौर पर प्रकृति के साथ और प्रकृति के भरोसे काम कर रहे हैं । लगभग 6 करोड़ मौसमी मजदूर हैं जो काम के सिलसिले में लगातार अपने गांव से बाहर जाते हैं और लौटते हैं।प्रकृति निर्भर समुदायों की आर्थिक गतिविधियां जो बड़े पैमाने पर जीवन निर्वाह और छोटी आय के लिए है। वर्तमान आर्थिक नीतियों के कारण, जो कॉर्पोरेट्स और बड़े व्यवसायों का समर्थन करती है, प्रकृति निर्भर समुदाय के लिए अव्यवहारिक होती जा रही है। विकास के पूंजीवादी तरीके और राज्य की आर्थिक नीतियां, जो पर्यावरण के खिलाफ और जन विरोधी है, जिसके कारण प्रकृति निर्भर समुदाय हाशिये पर चले जाते हैं और गरीबी के चंगुल में फंस जाते हैं।इन समुदायों में किसान,मछुआरा,वन निवासी और पशु पालकों की एक समान जरूरत है जैसे भूमि, पानी (नदी, झील, आर्द्रभूमि, समुद्री जल निकाय ) और जंगलों तक सुगम पहुंच सुनिश्चित करना और राज्य के समर्थन से इन संसाधनों का अंतहीन दोहन करने वालों से रक्षा करने की जरूरत है।

ये सभी स्व-रोजगारी मजदूर प्राथमिक उत्पादक हैं और जैविक जीवित संसाधनों पर निर्भर हैं। ये समुदाय मुख्य रूप से अपनी आजीविका के लिए काम करते हैं न कि पूंजी संचय के उद्देश्य से। पूंजीवादी प्रणाली में उत्पादन और वितरण समाजिक समानता, न्याय और पर्यावरण की सुरक्षा की बजाय निजी मुनाफे से संचालित होती है और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और विनाश पर अधारित विकास के कारण उन समुदायों को विस्थापित होना पड़ता है जो इन संसाधनों पर निर्भर हैं। यह प्राकृतिक संसाधन पारिस्थितिकी को संतुलित रखता है, बल्कि ग्रामीण आजीविका, जैव विविधता, और जलवायु अनुकूलन के लिए भी महत्वपूर्ण है। जलवायु संकट की वैश्विक घटना पूंजीवाद के कारण पैदा हुई है, और अब यह भारत में भी साफ तौर पर दिखाई देने लगी है, जिसका खामियाजा प्रकृति निर्भर मजदूर सूखा, गर्मी, अनियमित वर्षा, बाढ़ और समुद्र के स्तर में वृद्धि के रूप में भुगत रहे हैं। जबकि इस संकट के लिए प्रकृति निर्भर मजदूरों का योगदान नगण्य है। इन संसाधनों के संरक्षण और संवर्धन के लिए दीर्घकालिक योजना पर कार्य करने की आवश्यकता है।जिससे एक बेहतर, समान और टिकाऊ भविष्य का निर्माण हो सके।

संसद की कृषि सम्बंधी ‘स्टैंडिंग कमिटी’ (2024) के अनुसार भारत का 51 प्रतिशत खेती योग्य क्षेत्र वर्षा पर निर्भर है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील है। देश के विभिन्न हिस्सों में बार-बार ‘चरम मौसम’ की घटनाओं के कारण फसल उत्पादन और आमदनी में गिरावट आई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष औसतन 15,168 किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं। इनमें से लगभग 72 प्रतिशत ऐसे छोटे किसान हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन है।उद्योगों द्वारा छोड़े जाने वाले रसायन और भारी धातु जल के प्रदूषण का कारण बन रहे हैं। इससे मछलियों की सेहत खराब हो रही है और उनकी संख्या कम हो रही है।जल प्रदूषण के कारण मछलियों की खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है, जिससे उनकी संख्या कम होती जा रही है। मछुआरा समुदाय का पानी तक पहुंच और उनके अधिकारों की रक्षा करना आवश्यक है ताकि वे अपनी आजीविका चला सकें।जेएनपीटी बंदरगाह नवी मुंबई के अतिक्रमण ने खाड़ी के मुहाने को 1600 मीटर से घटाकर 50 मीटर कर दिया है, जिससे मछुआरों के लिए मछली पकड़ने के अवसर कम हो गए हैं।

तटीय क्षेत्र के छोटे मछुआरों की आजीविका पूरी तरह से खाड़ी पर निर्भर है और बंदरगाह के अतिक्रमण ने उनकी जीवनरेखा को खतरे में डाल दिया है।
बंदरगाह के अतिक्रमण ने न केवल मछुआरों की आजीविका को प्रभावित किया है, बल्कि पर्यावरण पर भी नकारात्मक प्रभाव डाला है।

यह मुद्दे न केवल मछुआरों के लिए बल्कि पूरे समुदाय के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। इन मुद्दों का समाधान निकालने के लिए सरकार, स्थानीय प्रशासन और मछुआरों को मिलकर काम करना होगा। पिछले 10 वर्षों में पर्यावरण,वन नीतियों और कानूनों में कई परिवर्तन और संशोधन किये गए हैं। जिसके कारण वन भूमि के बड़े क्षेत्रों को गैर वनीकरण के लिए देने से लेकर अन्य नीतियों जैसे ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम, क्षतिपूर्ति वनीकरण और अन्य हस्तक्षेपों को लागू करना था। इन्हीं नितियों के कारण वन निवासियों को जंगलों से निकाला जा रहा है।देश के 53 टाइगर रिजर्व से 848 गांव के 89,808 परिवारों को कोर क्षेत्र से निकाला जाने की कार्यवाही जारी है। अभी तक 257 गांव के 25,007 परिवारों को बाहर किया जा चुका है।2016 में जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी की गई वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 1950 से 1990 के बीच देश में 87 लाख आदिवासी विस्थापित हुए थे जो कुल विस्थापितों का 40 प्रतिशत है।

वर्धा जिले के आदिवासी समुदाय और गवली (पशुपालन समुदाय) लोगों को वन विभाग परेशान करता है। जबकि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत पशुपालन समुदायों के अधिकारों को मान्यता देने के प्रावधान हैं। यह अधिनियम समुदायिक वन संसाधन अधिकारों को परिभाषित करता है, जिसमें पारंपरिक या परम्परागत सीमाओं के भीतर वन भूमि और पशुपालन समुदायों के लिए मौसमी उपयोग के परिदृश्य भी शामिल हैं। इसलिए प्रकृति निर्भर मजदूरों की आजिविका सुरक्षित करने के लिए सरकार और समाज को आवश्यक हस्तक्षेप करना चाहिए। मछुआरों की आजिविका स्वच्छ नदियों पर निर्भर है इसलिए नदियों के प्रवाह को निर्बाध बहने दिया जाए, उन्हें प्रदूषण से मुक्त रखा जाए, उनके कुदरती प्रवाह को नहीं रोका जाए और आद्रभूमि को बचाया जाए।वन निवासियों और वन पर निर्भर लोगों के अधिकारों को पूर्ण मान्यता देकर वनों और उनके सभी संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन और प्रबंधन उनके हाथों में सौंप दिया जाए ताक़ि समुदाय-आधारित विकेंद्रीकृत शासन प्रणालियों को लागू किया जा सके। आदिवासी कल्याण मंत्रालय दिल्ली द्वारा 12 जुलाई 2012 को जारी दिशा निर्देश में लिखा है कि की राज्यों में लघु वन उपजों, विशेष तौर पर कीमती उपजों जैसे – तेंदूपत्ता के व्यापार में वन निगमों का एकाधिकार वन अधिकार अधिनियम 2006 की प्रवृत्ति के विरुद्ध है और इसे दूर किया जाए। राज्य सरकारें न केवल, वनों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति व अन्य वन निवासियों को लघु वन उपजों पर निर्बाध अधिकारों को प्रदान करने में सहयोगकर्ता की भूमिका निभाएं, वरन् लघु वन उपजों के पारिभाषिक मूल्य दिलाने में मदद करें।

असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले प्रकृति निर्भर मजदूरों की समाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं होती है। महिलाओं को अक्सर पुरुष मजदूरों की तुलना में कम मजदूरी दिया जाता है और उन्हें समाजिक रुप से कमजोर माना जाता है।इन मजदूरों की समाजिक – आर्थिक स्थिति उन चुनौतियों का एक जटिल स्वरूप को दर्शाती है, जिनके लिए बहुयामी समाधान की आवश्यकता है।

राज कुमार सिन्हा | बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

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