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देश और दुनिया कोरोनावायरस महामारी के इस सकंट को फैलने से बचाने मे लगे है। लाखों मजदूर भुखे और प्यासे पैदल आपने गाँवों की और लौट रहे है। यह कहना भी असंगत नहीं होगा की यह अनियोजित लॉकडाउन केवल मजदूर वर्ग के लिये ही है। लेकिन इस दौर में दूसरी ओर सरकारें और निजी कंपनियां अपने काम बडी तेजी से निपटाने मे लगी। मध्यप्रदेश सरकार ने अडानी की छिदवाड़ा पेचं थर्मल पावर परियोजना के साथ बिजली खरीद करार किया। ज्ञात हो कि यह करार दो माह पूर्व व प्रदेश मे सरकार बदलने से पहले हो चुका था। कर्मचारी युनियन से इसका तत्काल ही एक विज्ञप्पती निकाली थी। सरकार बदलने के तुरतं बाद ही कोरोना का लाकडाउन प्रांरभ हो चुका था फिर भी मिडीयाॅ की नजर से छिपा लिया गया। इसकी सार्वजनिक जानकारी समाचार पत्रों 27 मई को मिली जब मध्यप्रदेश सरकार ने सूचान दी। राज्य सरकार द्धारा किये गये इस करार का 28 से भी अधिक जन संगठनों ने विरो किया है और उसको रद्ध करने की माॅग की है।
यह परियोजना 1320 मेगावाट क्षमता की कोयले पर आधारित है। जहाँ पूरी दुनिया कोयले से जुडे सभी उद्योगों से दूर जा रही है वहीं मध्यप्रदेश, भारत द्धारा किये गये पेरिस समझौते के विरोधाभास में जलवायू में कार्बन उत्सर्जन में योगदान कर रहा है। भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यन्वयन मंत्रालय की 2019 की रिर्पोट के अनुसार मध्यप्रदेश मे 20331 मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता पहले से ही स्थापित है और उसकी मांग 9000 मेगावाट है। इस आधार पर प्रदेश में सरप्लस बिजली उपलब्ध है। तो फिर सवाल उठता है की उसके बावजूद ऐसी कौन सी जल्दबाजी है जिससे मध्यप्रदेश सरकार को अदानी से 1320 मेगावाट बिजली खरीद का करार करना पड रहा है? इस तरह की बिजली खरीद करार का किसको फायदा होने वाला है? और इसके क्या महत्वपूर्ण कारण हैं ?
आम लोगों के वोट से सत्ता पर काबिज होन वाली सरकारें, हर तरह की लाज शर्म को तिलांजलि देकर बेशर्मी से पूॅजी और उधोंगों के हित मे खंडी हो गई है। मध्यप्रदेश मे इसकी बानगी ऊर्जा या बिजली क्षेत्र हैजिसमे विधुत उत्पादन के सरकारी कारखाने बनने वाली सस्ती बिजली को छोडकर निजी कम्पनियों की महंगी बिजली खरीदी जा रही है। जाहिर है ये धतकरम आम लोगो की जेबों और के खजानों पर डाका डालेगें

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