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आगामी 2 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में वन अधिकार कानून पर महत्वपूर्ण केस की सुनवाई होगी। ज्ञात हो कि 2019 में जब इस मामले की सुनवाई हुई थी,तब सत्रह लाख से भी अधिक परिवारों को संभावित बेदखली का सामना करना पड़ा था। हालांकि तब कोर्ट ने अपने इस आदेश को रोक दिया था और परिवारों पर मंडरा रहे बेदखली के संकट को टाला जा सका था।लेकिन ऐसा क्यों हुआ? एक वन्यजीव एनजीओ चाहता है कि सर्वोच्च अदालत उन लोगों को बेदखल करने का आदेश दे, जिनके वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत व्यक्तिगत वन अधिकारों के दावे खारिज कर दिए गए थे। भले ही इस बात के पर्याप्त सबूत हों कि उनके दावों को अवैध और गलत रूप से खारिज किया गया है। 2 अप्रैल को वे फिर से ऐसा करने की कोशिश करेंगे और और ज्यादा जोर लगाएंगे। वे अब चाहते हैं कि अदालत वनवासियों के लिए वन अधिकार अधिनियम से पहले की स्थिति को वापस स्थापित कर दे , जहां वन आश्रित समुदाय को अधिकार धारक नहीं बल्कि वन विभाग की दया पर रहना और जीवनयापन करना चाहिए।

फरवरी 2019 में, देशव्यापी विरोध के बाद अपने आदेश को रोककर, अदालत ने राज्य सरकारों को खारिज हुए दावों कि समीक्षा करने का निर्देश दिया था।
लेकिन यह समीक्षा प्रक्रिया फिर से उन्हीं लापरवाही से ग्रस्त हो गई, न तो केंद्र सरकार और न ही अधिकांश राज्य सरकारों ने इस कानून को लागू करने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए हैं। वन अधिकार अधिनियम 2006 आने से पहले भारत के वन कानून अंग्रेजों से विरासत में मिले थे। उन कानूनों के परिणामस्वरूप देश के लगभग एक चौथाई हिस्से कि भूमि को “वन भूमि” माना गया और सरकारी संपत्ति घोषित किया गया, बिना उन करोड़ों लोगों के अधिकारों पर विचार किए जो इन भूमियों पर रहते थे, उनका उपयोग करते थे और उनकी रक्षा करते थे। वन अधिकार अधिनियम अनुसूचित जनजातियों और “अन्य परम्परागत वन निवासियों” के लिए तेरह अधिकारों को कानूनी मान्यता देता है, जिसमें भूमि, लघु वन उपज, चरागाह आदि पर अधिकार शामिल हैं, साथ ही जंगलों की रक्षा और प्रबंधन के महत्वपूर्ण अधिकार भी शामिल हैं जैसा कि वे सदियों से करते आ रहे हैं।लेकिन यह कानून भारत की वन प्राशसन को पसंद नहीं आया क्योंकि यह वन आश्रित लोगों को बेदखल करने और परेशान करने के साथ-साथ वन भूमि को बड़ी परियोजनाओं या कंपनियों को सौंपने की उनकी शक्ति को भी छीन लेता है। नतीजतन, एक के बाद एक राज्य और केंद्र स्तर पर इसके क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न की गई है।

मुट्ठी भर वन्यजीव एनजीओ इस कानून के विरोध का चेहरा बन गए हैं। उन्होंने 2008-2009 में इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट और कई उच्च न्यायालयों का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वे इस कानून पर रोक लगाने के लिए अदालत से अनुरोध करने में असफल रहे। हालांकि, समय-समय पर उन्होंने इस मामले को वाइल्डलाइफ फर्स्ट द्वारा कानून को कमजोर करने के प्रयास करते रहे।

13 फरवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने 17 लाख या 17 लाख से अधिक वनवासियों को बेदखल करने का आदेश दिया, जिनके व्यक्तिगत वन अधिकार दावों को खारिज कर दिया गया था। इस आदेश ने पूरे देश में हड़कम मचा दिया । वन अधिकार समूहों के विरोध के बाद, जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने दावों को गलत तरीके से खारिज करने के लिए प्रक्रियात्मक खामियों को उजागर करते हुए कोर्ट में हस्तक्षेप किया, जिसके कारणवश अदालत को अगली सूचना तक बेदखली के आदेश पर रोक लगानी पड़ी और राज्यों को खारिज किए गए दावों की समीक्षा करने का निर्देश दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को दावों को खारिज करने के कारणों और आदेशों में अपनाई गई प्रक्रिया का विवरण रिकॉर्ड पर रखते हुए विस्तृत हलफनामा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। समीक्षा के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के संबंध में जनजातीय कार्य मंत्रालय की ओर से कोई स्पष्ट निर्देश या दिशानिर्देश नहीं दिए जाने के कारण, राज्यों ने अपने स्वयं के तंत्र और प्रक्रियाओं का पालन किया, जिससे अधिकारों के निर्धारण के लिए कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ और कुछ राज्यों ने तो ऐसी प्रौद्योगिकी का उपयोग किया, जो कानूनी प्रक्रिया, विशेषकर ग्राम सभाओं के निर्णय लेने के अधिकार को कमजोर करती है। दावेदारों या ग्राम सभाओं को उचित कारण बताए बिना या दावेदारों को अपील करने या अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिए बिना वन अधिकार दावों को खारिज कर दिया वन अधिकार नियमों के नियम 13 में साक्ष्य के कई रूपों को मान्यता दी गई है, जिसमें गांव के बुजुर्गों की गवाही और ग्राम सभा द्वारा क्षेत्र सत्यापन रिपोर्ट शामिल है।लेकिन इन्हें व्यवस्थित रूप से नजरअंदाज किया गया है। राज्य विशिष्ट साक्ष्य मांगना जारी रखता है। गुजरात में, उपग्रह इमेजरी, जो जंगल पर कब्जे का निर्धारण नहीं कर सकती है, को अनिवार्य साक्ष्य माना गया, जिसके कारण बड़े पैमाने पर दावों को खारिज किया गया। इसके अलावा, अन्य पारंपरिक वनऩिवासियों के दावों में कुल मिलाकर ख़ारिज किये जाने के दर में वृध्दि देखी गई है। 31.01.2025 तक, जनजातीय कार्य मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार, 18,06,890 (अठारह लाख छह हजार आठ नब्बे) दावे खारिज किए जा चुके हैं।

वन अधिकार अधिनियम में वनवासियों को बेदखली से स्पष्ट रूप से सुरक्षा प्रदान किए जाने के बावजूद, बड़े पैमाने पर विस्थापन बेरोकटोक जारी है। कई राज्यों में, 2005 से पहले वन भूमि पर खेती करने वाले वनवासियों को उनके दावों पर कार्रवाई किए जाने से पहले ही वन विभाग द्वारा जबरन बेदखल कर दिया गया था। इन लोगों को अब अपने अधिकारों का दावा करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, गलत तरीके से खारिज किए गए दावों के कारण खुद ही बेदखली हो गई है जो गैर कानूनी है। मध्य प्रदेश के रीवा और बुरहानपुर जिलों में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां वन विभाग ने बल प्रयोग किया है, खड़ी फसलों को नष्ट किया है और जुर्माना लगाया है। बेदखली के साथ साथ वन आश्रित समुदायों के अधिकारों का अपराधीकरण, उनपर जबरन केस लगाना, उन पर लगातार निगरानी रखना , उनकी अपनी उपभोग कि जमीन तक पहुंच पर रोकटोक और उसे सीमित करना उनके खेती के जमीन पर विभाग द्वारा जबरन बाङ लगाना इत्यादि ऐसे कई मामले कई क्षेत्रों में सामने आये हैं।

मध्य प्रदेश में वनमित्र जैसे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की शुरूआत ने समीक्षा प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के बजाय अतिरिक्त बाधाएं पैदा की है। कई वनवासियों के पास स्मार्ट फ़ोन, इंटरनेट या डिजिटल साक्षरता तक पहुंच नहीं है, जिससे उनके लिए दावा प्रस्तुत करने और ऑनलाइन अपील प्रक्रियाओं को करना असंभव हो जाता है। इन पोर्टलों का उद्देश्य पारदर्शिता लाना और उसे कारगर बनाना था, लेकिन इसके बजाय प्रक्रियागत उल्लंघन, बड़े पैमाने पर फिर से दावों का खारिज होना और ग्राम सभाओं को दरकिनार करना पड़ा है। ये प्लेटफ़ॉर्म अक्सर खराब हो जाते हैं, ठप्प पड़ जाते हैं, दावेदारों के खातों को लॉक कर देते हैं और सही दस्तावेज़ अपलोड करने में विफल रहते हैं। डिजिटल सबमिशन पर विशेष निर्भरता ने सबसे हाशिए के समुदायों के लिए अपने कानूनी अधिकारों तक पहुंचना लगभग असंभव बना दिया है। इसके अलावा, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म को बढ़ावा मिलने से नौकरशाही कि ताकत को आगे बढ़ाया है, जिसके कारणवश अब वन अधिकारों के सम्बन्ध में जिला और और राज्य स्तर के अधिकारियों द्वारा निर्णय लिए जा रहे हैं, जो दावों की पुष्टि के लिए ग्राम सभा और वन अधिकार समिति को अवैध रूप से दरकिनार कर रहे हैं। इससे कुछ अधिकारियों के हाथों में सत्ता का केंद्रीकरण हो गया है, जो सीधे तौर पर वन अधिकार कानून के विकेंद्रीकृत, लोकतांत्रिक और भागीदारी भरे दृष्टिकोण और कानूनी प्रणाली को कमजोर कर रहा है। कई राज्य सरकारें अब नए प्रधानमंत्री-जनजातीय उन्नत ग्राम अभियान (पीएम-जुगा) कार्यक्रम के तहत जनजातीय मंत्रालय द्वारा प्रचारित ऐसी तकनीक और ऐप-आधारित पोर्टल को लागू करने की योजना बना रही हैं। इससे और अधिक राज्यों में वन अधिकार कानून के कार्यान्वयन में बाधा आएगी। जनजातीय मंत्रालय ने वन मित्र आवेदन के बारे में भी गंभीर चिंताएं जताई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि वे 2 अप्रैल को न्यायालय को इन बिंदुओं से अवगत कराने जा रहे हैं या नहीं।

बीते कुछ वर्षों में वन और पर्यावरण कानूनों को कमजोर करने, विकास के नाम पर जंगलों और संसाधनों को कॉर्पोरेट के लिए डायवर्सन करने, साथ ही बहिष्कृत संरक्षण हस्तक्षेपों को बढ़ावा देने में वृद्धि हुई है। ये सभी राज्य-कॉर्पोरेट संचालित विकास हस्तक्षेप , पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम1996 , वन अधिकार कानून 2006 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 का उल्लंघन करते हुए किया जा रहा है, जिसके चलते अधिकारों की गैर-मान्यता और विस्थापन में वृद्धि हुई है। वन अधिकार कानून बेदखली और विस्थापन के खिलाफ स्पष्ट सुरक्षा प्रदान करता है और किसी भी स्थानांतरण और पुनर्वास के लिए पूर्व-आवश्यकताओं के रूप में अधिकारों की मान्यता और अधिग्रहण के साथ-साथ ग्राम सभा की स्वतंत्र सूचित सहमति को स्थापित करता है। संरक्षित क्षेत्रों के निर्माण के कारण 1,00,000 से अधिक लोग पहले ही विस्थापित हो चुके हैं और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने हाल ही में टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्रों से 64,८०१ परिवारों यानी तक़रीबन ४ लाख लोगों के विस्थापन में तेजी लाने का आह्वान किया है। इसके साथ ही औद्योगिक और ढांचागत परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर भूमि का हस्तांतरण और वन दोहन बेरोकटोक जारी है। पिछले 15 वर्षों में, 3 लाख हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को “विकास” उद्देश्यों के लिए डायवर्ट किया गया जिसमें 60 हजार हेक्टेयर भूमि का आवंटन केवल माइनिंग के लिए रहा। वन भूमि के इस तरह के हस्तांतरण और परिवर्तन को अक्सर वन अधिकारों की मान्यता और ग्राम सभा की सहमति के बिना ही अंजाम दिया जाता है, जो सीधे तौर पर वन अधिकार कानून प्रावधानों का उल्लंघन करता है, जिसे उड़ीसा माइनिंग कॉरपोरेशन बनाम पर्यावरण और वन मंत्रालय और अन्य [(2013) 6 एससीसी 476] में सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था। कोर्ट ने कहा कि “अगर जंगलों में और उसके आसपास रहने वाले लोग संरक्षण और पुनर्जन्न उपायों में शामिल हों तो जंगलों के बचने की सबसे बेहतर संभावना है”।
मुख्य बिंदु:

  • केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को 2 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट रूप से सूचित करना चाहिए कि वन अधिकार अधिनियम पूरी तरह से संवैधानिक है और खारिज दावों की समीक्षा की प्रक्रिया के साथ-साथ अधिकारों की मान्यता को भी अपने उचित क्रियान्वयन के लिए अपना समय और प्रवाह देना चाहिए। कोर्ट में इस मामले को खारिज कर दिया जाना चाहिए।
  • जनजातीय मामलों के मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि खारिज किए गए दावों की समीक्षा स्पष्ट दिशा-निर्देशों का पालन करती है जो प्राथमिक निर्णय लेने वाले निकाय के रूप में ग्राम सभा के अधिकार और भूमिका को बनाए रखते हैं और वन अधिकार कानून के तहत सत्यापन प्रक्रिया के प्रावधानों के अनुसार हैं। मंत्रालय को मनमाने ढंग से दावे खारिज किए जाने को रोकने, तर्कपूर्ण आदेशों की आवश्यकता और मौखिक गवाही और स्थानीय सत्यापन सहित कई तरह के साक्ष्य के उपयोग को अनिवार्य करने के लिए बाध्यकारी निर्देश जारी करने चाहिए।
  •  प्रौद्योगिकी का उपयोग केवल वन अधिकार कानून कार्यान्वयन प्रक्रिया को पूरक और समर्थन देने के लिए किया जाना चाहिए – जैसे कि दस्तावेजों का रिकार्ड बनाए रखना, दावेदारों को दावे की स्थिति को ट्रैक करने की सहूलियत देना और रिकॉर्ड तक सार्वजनिक पहुंच सुनिश्चित करना।
  • टाइगर रिजर्व और अन्य संरक्षित क्षेत्रों से तब तक कोई बेदखली और पुनर्वास नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि सभी दावों – जिनमें समीक्षाधीन खारिज दावे भी शामिल हैं – को वन अधिकार कानून के अनुपालन में सत्यापित नहीं किया जाता है। मंत्रालय सख्त निर्देश जारी करे कि जब तक कि दावेदार अपील के सभी रास्ते खत्म नहीं कर लेते तब तक जबरन बेदखली प्रतिबंधित है । इसके अतिरिक्त, इस निर्देश का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों को वन अधिकार कानून और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
  • टाइगर रिजर्व और अन्य संरक्षित क्षेत्रों से तब तक कोई विस्थापन और पुनर्वास नहीं होना चाहिए जब तक कि सभी दावों – जिनमें समीक्षाधीन दावे भी शामिल हैं – को वन अधिकार कानून के अनुपालन में संधारण/सत्यापित नहीं किया गया हो; साथ ही स्थानांतरण और पुनर्वास पैकेज के लिए उनकी सहमति – जिससे उचित मुआवज़ा और सुरक्षित आजीविका सुनिश्चित हो सके।
  • दावा आरंभ करने, सत्यापन और निर्णय लेने में ग्राम सभा के वैधानिक अधिकार और भूमिका की पुष्टि की जानी चाहिए, ताकि प्रशासनिक और तकनीकी व्यवस्था द्वारा ग्राम सभा कि शक्तियों पर अतिक्रमण को रोका जा सके। किसी भी दावे की खारिज करने पर उसको लिखित कारण के साथ अपील का उचित अवसर देते हुए सम्बंधित आवेदक व् ग्राम सभा को सूचित किया जाना अनिवार्य है।
  •  सुनिश्चित किया जाए कि, खनन, बुनियादी ढांचे और संरक्षण के लिए वन भूमि के डायवर्सन को वन अधिकार कानून प्रावधानों, विशेष रूप से स्वतंत्र और पूर्व सूचित ग्राम सभा की सहमति की आवश्यकता का सख्ती से पालन करना अनिवार्य हो।

राज कुमार सिन्हा | बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

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