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नेशनल थर्मल पाॅवर काॅरपोरेशन (एनटीपीसी) भारत के चार ‘‘नवरत्नों‘‘ में से एक होने के साथ, एक “फार्च्यून 500″ कंपनी भी है। भारत के विकास में एनटीपीसी ने चार दशकों से ऊपर एक अहम् भूमिका अदा की है। पश्चिमी देशों में तय किया गया विकास का ढांचा पूर्ण रूप से ऊर्जा पर निर्भर है और जिसने विगत वर्षों में जन-जीवन, पर्यावरण और निरंतरता पर गहन रूप से नकारात्मक प्रभाव डाले हैं।

एनटीपीसी ने अपनी शुरुआत तापीय विद्युत् परियोजनाओं के साथ की थी, पर पिछले कुछ सालों में अपने कार्य क्षेत्रों को बढ़ा कर गैस, जल-विद्युत् परमाणु ऊर्जा और यहाँ तक कि नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी अपने काम को बढ़ाया है। इसके साथ ही एनटीपीसी ने कोयला खनन के क्षेत्र में भी प्रवेश किया है। बिजली के क्षेत्र में भारत की सबसे बड़ी कंपनी होने के साथ, विश्व की पांच सबसे बड़ी कंपनियों में एक बन गयी है। उसके साथ ही एनटीपीसी भारत की मौजूदा बिजली जरूरतों का एक चैथाई हिस्सा पूरा करती है।

हालाँकि, जन-जीवन और पर्यावरण को इसका एक भारी नुकसान उठाना पड़ा है। फिर चाहे वो जंगलों और अन्य प्राकृतिक सम्पदाओं का विनाश, बिना पुनर्वासन के जबरन बेदखली, प्रदूषण, बिजली घरों के पास रह रहे लोगों के स्वास्थ्य को खतरा, भू-जलप्रदूषण, या कचरों एवं राख के निष्पादन से जुड़ी समस्याएं।

वैसे तो एनटीपीसी के अलग-अलग परियोजनाओं और उसके प्रभावों का कुछ हद तक दस्तावेज़ीकरण हुआ है। उसी तरह कुछ दस्तावेज़ीकरण चुनिंदा एनटीपीसी परियोजनाओं से जुड़ी घटनाओं के लिए हुआ है, जैसे हज़ारीबाग मामले में प्रभावित लोगों द्वारा विरोध किये जाने पर पुलिस अत्याचार या फिर ऊंचाहार त्रासदी में जहाँ कई सुरक्षा मानकों को नजर अंदाज किया गया, जिसमें सैकड़ों मज़दूरों की मौत हुई। लेकिन मानव अधिकारों औरभू-अधिग्रहण, जंगल, जलप्रदूषण और ऐसे कई कानूनों के उल्लंघनों का कोई संकलन मौजूद नहीं है।

यह पुस्तिका ऐसी जानकारियों को एकतित्र करनेका एक प्रयास है जिससे एनटीपीसी का दूसरा चेहरा उजागर हो सके।

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