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मध्यप्रदेश के अधिकांश बड़ा शहर भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन, सागर का पेयजल प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नदियों, तालाबों और भूमिगत जल पर निर्भर है। इन सभी स्रोतों पर शहरी सीवेज, औद्योगिक कचरे और ठोस अपशिष्ट का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अपर्याप्त क्षमता के हैं या कई जगह पूरी तरह से निष्क्रिय हैं। परिणामस्वरूप, आंशिक या बिना उपचारित गंदा पानी सीधे जल स्रोतों में छोड़ा जा रहा है।


भोपाल स्थित राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने हाल ही में यह स्वीकार किया है कि इंदौर के अलावा राज्य के अन्य बड़े शहरों में भी जल स्रोतों के प्रदूषित होने की गंभीर संभावना मौजूद है। यह टिप्पणी न केवल प्रशासनिक विफलताओं की ओर इशारा करती है, बल्कि प्रदेश के शहरी जल प्रबंधन मॉडल पर भी गहरे सवाल खड़े करती है। एनजीटी की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब शहरी आबादी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन सीवेज शोधन, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और जल स्रोतों की सुरक्षा की व्यवस्था उसी अनुपात में विकसित नहीं हो पाई है। नदियों, तालाबों और भूमिगत जल स्रोतों में बिना उपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट का प्रवाह एक स्थायी खतरा बन चुका है।अधिकरण ने कहा कि शहरी सीवेज के अपर्याप्त उपचार, औद्योगिक अपशिष्ट के अनियंत्रित निस्तारण और जल स्रोतों की नियमित निगरानी के अभाव के कारण यह संकट गहराता जा रहा है। एनजीटी ने राज्य सरकार और संबंधित नगरीय निकायों को जल स्रोतों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की कार्यक्षमता बढ़ाने तथा जनस्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए हैं।यह टिप्पणी किसी एक दुर्घटना या स्थानीय प्रशासन की चूक भर नहीं है, बल्कि मध्यप्रदेश के अधिकांश शहरों में व्याप्त एक गहरी, संरचनात्मक समस्या की ओर संकेत करती है। नदियों, तालाबों और भूमिगत जल पर निर्भर शहरी आबादी के लिए यह एक चेतावनी है कि संकट अब दरवाज़े पर नहीं, घर के भीतर प्रवेश कर चुका है। जबलपुर में नर्मदा नदी धार्मिक, सांस्कृतिक और पेयजल तीनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन शहर का बड़ा हिस्सा अपना सीवेज सीधे नर्मदा या उसकी सहायक नालियों में डालता है। कई स्थानों पर नालियां बिना किसी शोधन के नदी में मिल रही हैं।


बरसात के मौसम में स्थिति और गंभीर हो जाती है, जब शहर का गंदा पानी सीधे नदी में पहुंचता है। इसके बावजूद नर्मदा को ‘स्वच्छ’ बताने का सरकारी दावा जमीनी हालात से मेल नहीं खाता।जबलपुर के गोंड काल में बना तालाब कभी स्थानीय लोगों के लिए जल संग्रह और भू-जल रिचार्ज का महत्वपूर्ण स्रोत था। आज वही तालाब शहरी उपेक्षा और प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक बन चुका है। तालाब का बड़ा हिस्सा गंदगी, प्लास्टिक कचरे और घरेलू अपशिष्ट से पट चुका है, जिससे यह जल संरचना अब धीरे-धीरे एक कचरा घर में तब्दील हो रही है। यह स्थिति केवल सौंदर्य या पर्यावरण की नहीं, बल्कि सीधे जनस्वास्थ्य से जुड़ा हुआ संकट है। तालाब में जमा सड़ा हुआ कचरा मच्छरों, दुर्गंध और जलजनित रोगों को बढ़ावा दे रहा है। आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए यह तालाब अब राहत नहीं, बल्कि बीमारी का स्रोत बनता जा रहा है। इस तालाब की उपेक्षा केवल स्थानीय समस्या नहीं है। यह पूरे शहर में जल स्रोतों के प्रति उदासीन रवैये को उजागर करती है। जबलपुर जैसे शहर में, जहां नर्मदा जीवनरेखा है, वहां तालाबों का इस तरह बर्बाद होना भविष्य के जल संकट को और गहरा करेगा। ग्वालियर के आस-पास बहने वाली छोटी नदियां और नाले गंदे पानी के लिए मार्ग बन चुकी हैं। नगर क्षेत्रों में सीवेज ट्रीटमेंट की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण अपशिष्ट सीधे नदी और नालों में जा रहे हैं, जिससे नदियों और तालाबों का पानी स्वास्थ्य के लिए खराब हो रहा है। ग्वालियर जिला सहित संभाग में भू-जल का स्तर तेजी से गिर रहा है क्योंकि ज़्यादातर पानी बोरवेल और ट्यूबवेल के माध्यम से निकाला जाता है। ग्वालियर शहर के कई क्षेत्रों में नल का पानी महीनों तक नहीं आता, जिससे लोग बोतलबंद और टैंकर के पानी पर निर्भर रहते हैं। यह जल प्रबंधन और आपूर्ति नेटवर्क के कमजोर होने का संकेत है। ग्वालियर संभाग में जल प्रदूषण और जल संकट दोनों से आम जनता परेशान हैं। मालवा क्षेत्र के बारे में लंबे समय से एक आम कहावत है “पग-पग रोटी, डग-डग नीर” अर्थात हर कदम पर भोजन और हर कदम पर पानी। मालवा में इंदौर शहर भी ऐतिहासिक रूप से अपने जल स्रोतों जैसे बावड़ियों, तालाबों और कुओं के लिए जाना जाता था। समय के साथ, जैसे-जैसे इन पारंपरिक जल स्रोतों की उपेक्षा की गई और नर्मदा जल आपूर्ति परियोजनाओं पर निर्भरता बढ़ गई। यह भी एक सच्चाई है कि एशियाई विकास बैंक(एडीबी) से ऋण सुरक्षित करने के लिए, शहरी सार्वजनिक जल आपूर्ति प्रणाली को जानबूझकर “विफल” के रूप में पेश किया गया, ताकि एडीबी की शर्तों के तहत सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के नाम पर निजीकरण का रास्ता साफ किया जा सके।एडीबी ऋण की शर्तों में बेहतर प्रबंधन के नाम पर जल आपूर्ति के विभिन्न घटकों के संचालन को निजी कंपनियों को सौंपना शामिल था। इसमें नगर निगम के कर्मचारियों की छंटनी और जल वितरण, बिलिंग और राजस्व संग्रह, संचालन और रखरखाव, मीटरिंग और संबंधित गतिविधियों को निजी फर्मों को आउटसोर्स करना शामिल था। बदले में, नागरिकों को 24 घंटे पानी की आपूर्ति का सपना दिखाया गया।


सरकार की भूमिका धीरे-धीरे नियामक तक सीमित होती जा रही है।सार्वजनिक जल आपूर्ति पर नगर निगम और स्थानीय निकायों की जवाबदेही धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। निजी कंपनियां सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रहती हैं, जिससे पारदर्शिता कम होती है। जनता की शिकायतों का समाधान भी जटिल और धीमा हो गया है।मध्यप्रदेश में पानी का निजीकरण केवल एक नीतिगत निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा सवाल है। गंभीर सवाल यह है कि नगर निगम और प्रशासन की निगरानी व्यवस्था कहां है?

राज कुमार सिन्हा । बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

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