ईरान के साऊथ पार्स गैस फील्ड पर इजरायली हमले के बाद मध्य पूर्व में तनाव चरम पर पहुंच गया है। साउथ पार्स गैस फील्ड पर यह हमला केवल एक सैन्य घटना नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा प्रहार है। आपूर्ति में रुकावट के कारण कई देशों को लंबे समय तक ऊर्जा की कमी का सामना करना पड़ सकता है। द इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार अंतराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इतिहास का सबसे खराब वैश्विक ऊर्जा व्यवधान बताया है, जो 1973 के अरब तेल प्रतिबंध को भी पीछे छोड़ दिया है। मुख्य निवेश अधिकारी डैन पिकरिंग ने कहा कि आप ऊर्जा संरक्षण के जरिए इस समस्या से बच नहीं सकते। इसका नतीजा यह होगा कि कीमतें इतनी बढ़ जाएंगी कि लोग उपभोग करना बंद कर देंगें। यह पहली बार है जब खाड़ी क्षेत्र में ईरान के ऊर्जा ढांचे को सीधे निशाना बनाया गया है। 17 मार्च तक, अमेरिका और इज़राइल ने खाड़ी में ईरान के ऊर्जा उत्पादन केंद्रों को निशाना बनाने से परहेज किया था। यहां तक कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के 90 प्रतिशत तेल निर्यात के केंद्र खारग द्वीप पर हमला किया, तब भी केवल सैन्य ठिकानों को ही निशाना बनाया गया था। इजराइल द्वारा कतर के साथ साझा किए जाने वाले साऊथ पार्स गैस क्षेत्र पर हमले के बाद यह स्थिति बदल गई है। पार्स गैस फील्ड दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडार का हिस्सा है, जिसे ईरान कतर के साथ साझा करता है। इस घटना को अमेरिका और इजराइल के साथ चल रहे युद्ध को बड़े ऊर्जा संकट के रूप में देखा जा रहा है। जवाब में ईरान ने सऊदी अरब, यूएई और कतर के ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया। ईरान ने सऊदी अरब में तेल कंपनी अरामको की रिफाइनरी के साथ-साथ कतर और यूएई में गैस सुविधाओं पर ड्रोन और मिसाइलों से हमला किया। यह युद्ध का एक खतरनाक मोड़ साबित हो रहा है। साउथ पार्स गैस क्षेत्र, भारत सहित वैश्विक एलएनजी आपूर्ति की रीढ़ है। इजरायली हमले के बाद तेल और गैस की कीमतों में आई तत्काल वृद्धि से इसके महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही पर रोक लगाने के कारण दुनिया पहले से ही कच्चे तेल की आपूर्ति में व्यवधान से जूझ रही है। ऐसे में उत्पादन सुविधाओं को होने वाली किसी भी क्षति का प्रभाव वर्षों तक बना रह सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में चल रही बाधाओं ने यह दिखा दिया है कि एक छोटा समुद्री मार्ग भी वैश्विक सप्लाई चेन को हिला सकता है। कतर के रास लाफान औद्योगिक शहर, जो दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी निर्यात केंद्र है, ईरानी मिसाइल हमलों से तबाह हो गया है। रास लाफान पर हमलों के कारण कतर की कुल एलएनजी निर्यात क्षमता में लगभग 17 प्रतिशत की कमी आई है। कतर एनर्जी के अधिकारियों के अनुसार, इस नुकसान की मरम्मत में 3 से 5 साल का समय लग सकता है, जिससे यह एक दीर्घकालिक संकट बन गया है। इस हमले से कतर को प्रति वर्ष लगभग 20 अरब डॉलर के राजस्व का नुकसान होने का अनुमान है।
यह हमला केवल कतर तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर भी इसका बड़ा असर पड़ा है। भारत अपनी प्राकृतिक गैस जरूरतों का लगभग 40 से 50 प्रतिशत कतर से आयात करता है, इसलिए यह स्थिति भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती है। मध्य पूर्व से चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया को तेल का लगभग 75 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस का 59 प्रतिशत निर्यात होता है।
इन सभी अर्थव्यवस्थाओं को तेल-गैस की कमी का सामना करना पड़ रहा है। होटल, रेस्टोरेंट, पर्यटन और उत्पादन जैसे कई क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं। नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनआरएआई) ने कहा है कि खाध सेवा उद्योग का 75 फिसदी हिस्सा एलपीजी पर निर्भर है और लंबे समय तक इसकी कमी रहने से अर्थव्यवस्था को प्रतिदिन 12 से 13 हजार करोड़ रुपए नुकसान हो सकता है। युद्ध के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 39 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं। ईंधन और प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतों से दुनिया भर में माल ढुलाई और उत्पादन लागत बढ़ गई है, जिससे महंगाई बढ़ रही है। भारत में भी प्रीमियम पेट्रोल 2 रुपए और इंडस्ट्रियल डिजल 22 रुपए प्रति लीटर महंगी हो गई है। दुनिया भर में यूरिया की कुल आपूर्ति में कतर का लगभग 10 प्रतिशत योगदान है। लेकिन ईरानी हमले की वजह से कतर के कई प्लांट बंद हैं, जिससे भारत में भी खाद की किल्लत बढ़ सकती है। यदि यह संघर्ष लंबा चलता है, तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी की ओर धकेल सकता है। ऊर्जा और खाद्य कीमतों में वृद्धि ने वैश्विक मुद्रास्फीति को बढ़ाया है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने वैश्विक वृद्धि दर के अनुमान घटाए हैं। विकासशील देशों में पूंजी प्रवाह कम हुआ है। कई देशों ने अपने रक्षा बजट बढ़ा दिए हैं, जिससे सामाजिक और विकासात्मक खर्चों पर दबाव बढ़ा है। भारत सहित वैश्विक शेयर बाजारों में भारी गिरावट देखी गई है। भारतीय शेयर बाजार में पिछले तीन सप्ताह में 27 से 34 लाख करोड़ रुपये तक की संपत्ति का नुकसान हुआ है। विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पूंजी निकाल रहे हैं। मूडीज के अनुसार, ऊर्जा की कीमतें बढ़ती रहीं तो भारतीय रुपये पर दबाव और बढ़ेगा। खाङी देशों में 90 लाख भारतीय काम कर रहे हैं। युद्ध के कारण 50 हजार भारतीय वापस देश लौट चुके हैं। अगर युद्ध लंबा खिंच गया तो काम प्रभावित होगा और शेष भारतीय भी वापस लौटने को मजबूर होंगे। खाङी देशों में भारतीय काम करके अच्छा खासा रेमिटेंस भारत में भेजते हैं। जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि यदि संघर्ष जारी रहता है, तो कतर और कुवैत की जीडीपी में 14 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। यह विदित है कि युद्ध के कारण अनिश्चितता बढ़ती है, जिससे निजी निवेश रुक जाता है और वित्तीय प्रणाली कमजोर होती है। युद्ध राष्ट्रीय ऋण में वृद्धि, उच्च मुद्रास्फीति, बुनियादी ढांचे के विनाश और दीर्घकालिक आर्थिक विकास में गिरावट का कारण बनता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुए 100 से अधिक युद्धों के अध्ययन में यह पाया गया कि इन संघर्षों के कारण संबंधित देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर गंभीर और दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़े। वर्तमान युद्धों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बहुआयामी संकट में डाल दिया है। यदि यह संघर्ष जल्द समाप्त नहीं होता, तो यह 1990 के बाद के सबसे बड़े आर्थिक संकटों में से एक बन सकता है। यह संकट दुनिया भर के उपभोक्ताओं, व्यवसायों और नीति निर्माताओं के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है और वैश्विक मंदी के जोखिम को बढ़ा रहा है।
राज कुमार सिन्हा । बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ
